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Saturday, July 6, 2013

फादर्स डे (लघुकथा )


''हैपी फादर्स डे  डैडी  ........" !!  मन्टू आधी नींद में लेटे हुए सुरेश से लिपटते हुए चहका। अपनी आँखों को पूरा खोलने  का प्रयास करते हुए सुरेश मुस्कुराया और "थैंक यू बेटा ........ "  कहते हुए मन्टू को अपने पेट पर गिरा लिया। रितु भी मुस्कुरा उठी बाप बेटे के इस लाड़ को देखकर। नींद की गिरफ़्त से बाहर निकलकर सुरेश बाथरूम की ओर बढ़ा , तभी सहसा उसे कुछ याद आया।
" अरे !! आज फादर्स डे है !! मैं भी पापा को विश कर दूँ। वैसे भी कई महीने हो गये उनसे बात किये हुए।"
"जी डैडी! हम उनसे मिलने भी नहीं गये इत्ते दिन से।"  नन्हे मन्टू के फूले गाल थोड़ा और फूल गये। अपनी दोनों बाहों को मोड़कर एक दूसरे के बीच फँसाते हुए उसने शिकायत सी की। 

"हम्म...........  आज चलें ? छुट्टी भी है, और उन्हें फादर्स डे पर सरप्राइज भी दे देंगे। "  सुरेश ने मन्टू को खुश करने की कोशिश की और रितु  की ओर  सहमति के लिए देखा।

"यैस्स्स ................... "  मन्टू को मानो खजाना मिल गया। उसके गुलाबी होठों पर मुस्कान तैर गयी और फूले गालों की हवा थोड़ी सी निकल गयी। रितु ने भी मौन स्वीकृति दे दी।

       फादर्स डे पर कोई उपहार या गुलदस्ता लिए बिना नहीं जाना चाहिए, विश अधूरी लगती है, यह सोचकर सुरेश ने रास्ते से एक सुंदर गुलदस्ता भी ले लिया। 

       दरवाज़े पर पहुँच कर डोरबैल दबाई ! एक बार, दो बार , तीन बार .............. ! न ही किसी ने दरवाज़ा खोला, न कोई आहट ही सुनाई दी अंदर से। समझ नहीं आया कि घर में कोई है भी, या नहीं , क्योंकि दरवाज़ा लॉक वाला था, ताले वाला नहीं। पापा के नम्बर पर फोन किया , स्विच ऑफ़ था , माँ के पास मोबाइल था ही नहीं। 

    आखिर सुरेश ने सामने वाले फ्लैट की बैल बजाई। श्रीमती शर्मा निकलकर आयीं।
"नमस्कार ! ये सामने वाले गुप्ता जी के बारे में कुछ बता सकते हैं ,कि कहाँ गये होंगे ?"
श्रीमती शर्मा ने तीनों पर एक भरपूर दृष्टि डाली।
सुरेश उनकी आँखों के प्रश्न को पढ़कर बोला .... "जी मैं उनका बेटा हूँ , सुरेश ! क्या वो आपको बताकर गये हैं कि कब तक आएंगे ? "

"आपको नहीं पता ?" श्रीमती शर्मा की आँखों में आश्चर्य था, और माथे पर कुछ बल भी उभर आये थे। 
"वो हॉस्पिटल में दाखिल हैं तीन दिन से। गुप्ता जी का बाईपास हुआ है, बहन जी वहीं हैं तब से ..... " 

      सुरेश सकते में आ गया। उसे पता भी न चला कि कब उसके हाथ से गुलदस्ता छूटकर नीचे गिर गया था। वह सोच में पड़ गया कि इतनी बड़ी बात माँ पापा ने मुझसे छिपाई क्यों? इन्ही विचारों में उलझे हुए उसके कदम धीरे -धीरे बढ़ रहे थे , तभी उसे जवाब भी मिल गया ........ कुछ दिन पहले माँ का फोन आ रहा था , और वह मीटिंग में होने के कारण बात नहीं कर पाया। सोचा था बाद में कर लेगा, फुरसत में।
वह फुरसत , जो उसे उनके लिए कभी नहीं मिलती थी।

लघुकथाकार:  रचना त्यागी 'आभा'
मालवीय नगर, नई दिल्ली 
चित्र गूगल से साभार