फूलों से
लदे
हरे-भरे
नीम की महक
दे जाती
है मन को सुकून
भले ही
नीम कड़वा हो |
पेड़ पर
आई जवानी
चिलचिलाती
धूप से
कभी ढलती
नहीं
बल्कि खिल
जाती है
लगता, जैसे नीम ने
बांध रखा
हो सेहरा |
पक्षी
कलरव करते पेड़ पर
ठंडी छाँव तले राहगीर
लेते एक
पल के लिए ठहराव
लगता जैसे
प्रतीक्षालय हो नीम |
निरोगी काया के लिए
इन्सान
क्यों नहीं जाता
नीम की
शरण
बेखबर नीम
तो प्रतीक्षा कर रहा
निबोलियों
के आने की
उसे तो
देना है पक्षियों को
कच्ची -
कडवी,पक्की मीठी
निबोलियों
का उपहार |
रचनाकार: संजय वर्मा "दृष्टि "
संपर्क: १ २ ५, शहीद भगत सिंह मार्ग
मनावर, जिला- धार ( म. प्र. )
चित्र गूगल से साभार
प्यारे राष्ट्रगीत
सादर अपमानस्ते!
जानता हूँ
आप इन दिनों फिर से दुखी हैं, क्योंकि कुछ दिन पहले एक बार फिर से आपका अपमान लोकतंत्र की प्रतीक संसद में एक मूर्ख इंसान द्वारा किया गया। इसके पीछे उसने अपने धर्म का सहारा लिया। यह तर्क देने से पहले वह दुष्ट यह भूल गया, कि वंदे मातरम ही वह गीत था, जिसे गाते हुए हिंदू व मुस्लिम क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी के फंदों पर झूल गये थे। देश में चले स्वाधीनता आंदोलन के दौरान लोगों
में जोश पैदा करने के लिए आपको गाया जाता था। धीमे-धीमे आप लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गये। ब्रिटिश सरकार आपकी लोकप्रियता से घबरा उठी और आप
पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सोचने लगी। सन 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता
अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आपको गाया था।
कांग्रेस अधिवेशनों के अतिरिक्त आजादी के
आंदोलन के दौरान आपके प्रयोग के कई उदाहारण हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू
किया था, उसका नाम “वंदे मातरम” रखा था।
अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की
जुबान पर आखिरी शब्द “वंदे मातरम” ही थे। सन 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में
तिरंगा फहराया, तो उसके मध्य में “वंदे मातरम” ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिटिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से
सन 1921 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं. राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की
प्रतिबंधित पुस्तक “क्रांति गीतांजलि” में पहला गीत “मातृ वंदना” वंदे मातरम ही था। लेकिन इन सब बातों से बर्क को क्या फर्क पढ़नेवाला है। उसकी आँखों पर धर्मान्धता का पर्दा जो पड़ा हुआ है। इस जैसी मानसिकता वालों ने ही स्वाधीनता संग्राम में निर्णायक
भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आयी, तो वंदे मातरम के स्थान पर
सन 1911 में इंग्लैंड से भारत आए जार्ज पंचम की स्तुति में
रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे व गाये गये गीत जन गण मन को वरीयता दी होगी। उसे उसके धर्म में अंग्रेजी सम्राट की स्तुति में बना गीत गाना तो जायज है, लेकिन अपनी धरती माता की स्तुति करता हुआ गीत “वंदे मातरम” करना हराम लगता है। इसमें उसका कोई दोष नहीं है, दोष हमारे कानून का जो ऐसे देश द्रोहियों को ऐसा कर्म करने को प्रोत्साहित करता है। यदि ऐसे दुष्टों को शुरुआत में ही इनकी औकात दिखा दी जाए, तो शायद ये अपनी नीच हरकतों से बाज आ सकें। यह
तर्क देता है कि इस्लाम में वंदना करना नाजायज है, लेकिन जरा इस बेशरम से कोई जाकर
पूछे कि क्या ये अपनी पार्टी प्रमुख के पैर छूकर आशीर्वाद नहीं लेता है, जब जनता
के बीच वोटों की भीख माँगने जाता होगा तब अपना सिर नहीं झुकाता होगा, जब नमाज पढ़ता
है तो अपना सिर धरती माँ पर नहीं झुकाता है, जब ये जवान होगा तब महबूब की वंदना से
भरी हुई शायरी का मजा नहीं लेता होगा और अपनी माँ के आगे इसका सिर नहीं झुकता होगा। इस जैसे कुत्सित मानसिकता वाले लोगों के कारण
पूरी मुस्लिम कौम बदनाम हो जाती है। मेरे एक मुस्लिम मित्र के अनुसार, “बर्क
ने वन्देमातरम पढने से इंकार किया। ये खबर पढ़कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
बड़े दुःख की बात है, कि हमारे
मुस्लिम भाइयों को
वन्दे मातरम के मायने का ही नहीं पता। जबकि इस्लाम में अपने मुल्क को मादर -ए- वतन कहा गया
है। जिसका
मतलब भी वन्दे मातरम ही है। हमें अपनी
ज़मीन को माँ कहने में शर्म कैसी? हिन्दू भाई तो ज़मीन को सिर्फ माँ कहते हैं, लेकिन हम
मुस्लिम भारत माता को असली माँ समझते हैं। हम जिंदा रहकर भी अपनी माँ की हिफाज़त करते हैं और
मरने के बाद भी धरती माँ के आँचल में हमेशा के लिए सो जाते हैं, जबकि हिन्दू
भाई माँ के साथ रहते ज़रूर हैं, लेकिन मरने के बाद उसकी गोद में सो नहीं सकते।“
काश ऐसे विचारों से बर्क जैसी मानसिकता वाले लोगों को कुछ सबक मिल पाता। खैर कोई
गाये या न गाये लेकिन अपनी मातृ भूमि से प्रेम करने वाले आपको गाते रहे हैं, गाते
हैं और गाते रहेंगे।
बर्क
को अपनी भूल का एहसास हो इसी कामना के साथ वंदे मातरम।
आपको
गाकर गौरवांवित होता
भारत
माता का एक पुत्र
रचनाकार: सुमित प्रताप सिंह
अतिथि तुम कब जाओगे के युग में मेरे एक 50 की उम्र में ही सठियाए से लगने वाले प्राइवेट मित्र पिछले दिनों मुझे रिश्ते-नातों का महत्व समझाने बैठ गए। उनको टालने की गरज़ से मैंने पत्नी के द्वारा लगातार ड्राइंग रूम के पर्दे की ओट से ऑंखें दिखाए जाने के बावजू़द उनके लिए दो बार चाय की मांग कर डाली। मेरी पत्नी मेरी इस निर्लज्जता और निडरता का जवाब अवश्य देती, परन्तु वह इतनी भी बेवकूफ नहीं कि किसी बाहरी व्यक्ति को अपनी असलियत की भनक यूं ही लग जाने दे। मेरी किस्मत भी इतनी भली थी कि मेरे वह मित्र प्याले में बची-खुची चाय को पारिवारिक चीटियों व मक्खियों द्वारा कई-कई बार चूस लिए जाने के बाद भी मेरे घर से हिलने को तैयार नहीं थे। वह तो बाद में पता चला कि उनकी पत्नी मायके गई हुई है वरना तो वह पहले कभी मुझसे मिलने भी आते थे तो खिड़की से झांक कर मिलने में ही परम संतोष का अनुभव कर लेते थे। मैं जब-तक दरवाज़ा खोलकर उन्हें अंदर आने का न्यौता देता, वह ‘अरे, लो... पत्नी का फोन आ गया है..’ कहकर फरार हो जाते।
खैर, यहाँ बात हो रही थी रिश्ते-नातों के महत्व की। मेरे मित्र ने उस दिन बताया कि लोग आजकल रिश्ते-नातों का महत्व भूलते जा रहे हैं। जबकि बिना किसी से कोई रिश्ता गांठे आज आदमी चैन से मर भी नहीं सकता। अब मरने पर अर्थी को कंधा देने की जल्दी सबसे पहले नाते-रिश्तेदारों को ही तो होती है। इस अर्थी देने की बात पर मुझे वह पुराना दिन याद हो आया। उस दिन बारिश के मौसम में जब हम अपने पड़ोसी के दादा जी की अर्थी को लेकर शमशान घाट गए हुए थे तब वहाँ पास की लकड़ी की टाल पर पहले से ही कई लोग लाइन में लगे हुए थे। लकड़ी का दाम तो सबके लिए एक सा ही था परन्तु जान-पहचान के लोगों ने पहले से ही सभी सूखी लकड़ियॉं अपने-अपने लिए निकलवा रखी थीं। यहाँ इस अपने-अपने का मतलब स्वयं के लिए नहीं बल्कि अपने-अपने मृतकजनों के लिए ही समझा जाए।
हाँ तो बात जान-पहचान की थी। मेरे पड़ोसी ने लकड़ी वाले से लाड़ दिखाते हुए चाचा, ताऊ, दादा, भैया और न जाने कौन-कौन से अलंकरणों का सहारा लेकर उससे रिश्तेदारी गांठने की कोशिश की परन्तु रिश्ते कोई ऐसे ही थोड़े बन जाते हैं। अब यह कोई राजनीति तो है नहीं कि मौका मिलते ही किसी भी दल से अपना नाता गाँठने की मिन्नत करने लगो और दल वाला अपने फायदे के लिए आसानी से उसे स्वीकार भी कर ले।
वहाँ पहले से खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि अब-तक वह अपने और अपने पड़ोसियों के दादा, दादी, चाचा-चाची आदि के नश्वर शरीरों को जलाने के लिए यहाँ से बीसियों बार लकड़ियाँ खरीद चुका है। इसी कारण लकड़ी वाले से अब उसका ऐसा रिश्ता बन गया है कि यदि वह बिना मरे ही अपने आपको जलाने के लिए भी उससे लकड़ियाँ मांगे तो वह बिना पैसा एडवांश में लिए उसके लिए लकड़ियों का ढेर लगा देगा। यही नहीं यदि वह तसल्ली से जलना चाहे तो लकड़ी वाला जून की तपती दोपहरी में भी उसके लिए कहीं न कहीं से गीली लकड़ियों का इंतज़ाम कर ही देगा।
अब चूंकि मेरे मित्र महोदय का लकड़ी के उस टाल वाले से कोई रिश्ता-नाता नहीं था इसलिए उनके हाथों गीली लकड़ियाँ ही लगीं। उन गीली लकड़ियों के कारण उनके दादा जी के मिट्टी के शरीर को मिट्टी में मिलने में पूर दो दिन लग गए। इस बीच उनके नाते-रिश्तेदार भी इस चिंता में सूखते नज़र आए कि कहीं इस देरी का नाजायज़ फायदा उठाकर दादा जी पुनः जीवित न हो उठें। अब भला आज के ज़माने में एक ही आदमी की मौत पर बार-बार अपना गाँव, शहर छोड़कर भागे चले आना इतना आसान भी तो नहीं था, उन सबके लिए।
अचानक पड़ोसी के दादा जी की अर्थी से मेरा ध्यान हटा तो मैं यह देखकर घबरा गया कि मेरे मित्र महोदय आधे सोफे पर और आधे ज़मीन पर लटके हुए खर्राटे मारने में मशगूल थे।
उनकी इस अदा से मुझे पक्का समझ में आ गया था कि आज लोग रिश्ते-नातों से दूर क्यों होते चले जा रहे हैं। अभी मेरी समझ में कुछ और भी आता इसी बीच मित्र महोदय की नींद अचानक टूटी और वे फिर से रिश्ते-नातों की अहमियत की बांग देने बैठ गए।
उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा,‘देखो, रिश्ते-नातों का यह मतलब नहीं कि अपने खून के रिश्तों से ही जीवन भर चिपके रहा जाए। खून के रिश्तों के स्थान पर मुंहबोले रिश्ते कहीं अधिक अहमियत रखते हैं और काम के भी होते हैं। उन्होंने कहा, यदि जीवन में सफल होना है और अपने हर काम को सुचारू रूप से चलाते रहना है तो पुलिस से दोस्ती गाँठो, नेता से रिश्ते बनाओ, मोहल्ले के गुंडे से नाता जोड़ो और ज़रूरत पड़े तो गधे को भी अपना बाप बना डालो। उन्होंने बतौर उदाहरण अपने एक सगे मित्र का किस्सा सुनाते हुए कहा कि वह अपने ऑफिस में नए बॉस की सख्ती से सदैव परेशान रहता था। जब कभी भी वह ऊर्जा की बचत के लिए अपने चैम्बर की बत्ती बुझा कर नींद में शापिंग मॉल की सैर कर रहा होता था, बॉस उसके टेबल पर कोई न कोई ज़रूरी फाइल पटक जाते थे। इस बारे में मोहल्ले की मानवाधिकारी चाची से ली गई सलाह पर जब उन्होंने काम करना शुरू किया तो मानों उनके दिन ही फिर गए। चाची के कहे अनुसार उन्होंने बॉस के परिवार को दो-चार बार घर में दावत पर बुलाया, उनके बच्चों ही नहीं निजी कुत्ते तक को नहलाया, धुलाया और पार्कों में टहलाया। यही नहीं अपनी पत्नी के जन्म दिन पर खरीदी गई महंगी साड़ी तक उसने बॉस की पत्नी को बिना उनका हैप्पी बर्थ डे आए भेंट कर दी। इन सबसे बॉस और उनके घर वालों से उनका ऐसा नाता जुड़ा कि देखने वाले दांतों तले अपनी अच्छी भली उंगलियाँ भी चबा बैठे। उन्होंने इस किस्से को आगे खींचते हुए बताया कि अब उनका दोस्त ऑफिस में ऊर्जा की बचत किए बगैर आसानी से घंटों चैन की नींद सो पाता है।
मित्र के धारावाहिक किस्सों में थोड़ा विराम आया तो मैं रिश्ते-नातों पर नए तरीके से चिंतन करने बैठ गया। निश्चय ही आज जीवन में वही व्यक्ति सफल है जो वक्त देखकर किसी न किसी से अपना रिश्ता गाँठ बैठा है। एक लेखक अच्छे से अच्छा लिखकर भी क्या करेगा यदि उसके संपादक से अच्छे रिश्ते नहीं होंगे। आगे बढ़ने के लिए आज कर्मचारी को अपने बॉस से, पार्टी कार्यकर्ता को नेता से, चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को जनता से, अभिनेत्रियों को नग्नता से, विद्यार्थियों को अध्यापक से, डाक्टर को मरीज से, वाहन चालक को ट्रैफिक इंस्पेक्टर से, चोर-उचक्कों को थानेदार से और न जाने किसको-किसको किससे-किससे रिश्ता बनाए रखना पड़ता है। बेशक इन रिश्तों को बनाने के चक्कर में हमारे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, चाचा-ताऊ आदि जैसे सभी रिश्ते पीछे छूटते चले जा रहे हों। जिनके बिना कभी हमें इस संसार में अपना वजूद ही नहीं दिखाई पड़ता था।
रचनाकार: श्री किशोर श्रीवास्तव

नई दिल्ली
चित्र गूगल बाबा से साभार
हर बार की तरह इस बार भी उसने फेल होने पर एक नया बहाना बनाया और बड़ी सफाई से अपनी असफलता का ठीकरा परीक्षा के दिनों बिजली की अनुपलब्धता पर फोड़ दिया। बेटे के बहानों से तंग आ चुके पिता ने इस बार डांट-फटकार या मार की अपेक्षा अलग अंदाज़ में केवल इतना ही कहा, कि बेटे! यह बता जिसने बिजली का अविष्कार किया, उसने कौन सी बिजली के उजाले में पढ़ाई की?
इस बात का बेटे पर ऐसा असर हुआ, कि अगली परीक्षा में वह जिले भर में अव्वल आया।
लघु कथाकार: श्री कैलाश 'पर्वत'
दिबियापुर,औरैया, उ. प्र.