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सावधान! पुलिस मंच पर है

Monday, March 6, 2017

युगांडा का स्टेट हाऊस यानि सत्ता का एक मात्र केंद्र



ये है युगांडा के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास यानि स्टेट हाउस (State House) या राष्ट्रपति भवन...वैसा ही जैसा दिल्ली में हमारा राष्ट्रपति भवन है या फिर अमेरिका का व्हाइट हाउस. राजधानी कम्पाला(Kampala) से लगभग 37 किलोमीटर दूर एंटेबे (Entebbe) शहर में बना यह स्टेट हाउस तक़रीबन साढ़े 17 हजार वर्गमीटर में फैला है. अन्य देशों से आने वाले मेहमानों का स्वागत यहीं किया जाता है. हाल ही में 22-23 फरवरी के दौरान हमारे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी युगांडा गए थे हमें भी इस स्टेट हाउस को अन्दर से देखने का मौका मिला. इस झक सफेद इमारत का निर्माण हमारे राष्ट्रपति भवन (पहले वाइसराय भवन) की तरह ब्रिटिश हुकूमत ने कराया था. तब एंटेबे  ही युगांडा की राजधानी थी. युगांडा को 1966 में आज़ादी मिली और तब से यह यहाँ के राष्ट्रपति का स्थायी आवास और सत्ता का आधिकारिक केंद्र है. चूँकि एंटेबे में ही युगांडा का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है इसलिए कम्पाला के राजधानी बनने के बाद भी एंटेबे शहर का महत्व बना हुआ है. वैसे युगांडा में एक से ज्यादा स्टेट हाउस हैं लेकिन फिलहाल सत्ता की धुरी यही भवन है.

युगांडा के प्रथम राष्ट्रपति सर एडवर्ड मुतिसा (Sir Edward Muteesa) ने यहाँ रहना पसंद नहीं किया क्योंकि वे अपने महलों का मोह नहीं छोड़ पाए. इसीतरह युगांडा के सबसे चर्चित राष्ट्रपति ईदी अमीन (Idi Amin) ने भी 1971 की शुरुआत में तो इसका इस्तेमाल किया लेकिन बाद सुरक्षा के लिहाज से वे भी 1976 में इस सरकारी आवास को छोड़कर चले गए. बाद के राष्ट्रपतियों ने भी स्टेट हाउस की उतनी कद्र नहीं की लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति योवेरी के मुसेवनी (Yoweri K Museveni) ने न केवल इसको अपना आधिकारिक आवास बनाया बल्कि इसकी साज-संवार भी की. स्टेट हाउस को महज 1584 वर्गमीटर से बढ़ाकर साढ़े 17 हजार वर्गमीटर तक फैलाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. यहाँ के सम्मलेन कक्ष में एक साथ 500 मेहमान बैठ सकते हैं. इसके अलावा, स्टेट हाउस परिसर में प्रथम महिला (First Lady) का निवास, राष्ट्रपति के सलाहकारों के घर, सुरक्षा भवन, संचार भवन, कई सम्मलेन कक्ष, अतिथि कक्ष, मनोरंजन कक्ष और हेल्थ क्लब भी है. यह खूबसूरत भवन अब युगांडा की पहचान और सत्ता का प्रतीक है. स्टेट हाउस हमारे उपराष्ट्रपति के अलावा ब्रिटेन की महारानी सहित कई दिग्गजों की मेजबानी कर चुका है.

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जिंजा : जहां गांधी जी के भी प्राण बसते है

                                              My Rwanda-Uganda visit with Vice President: One

जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि मुझे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी जी के साथ 19-23 फरवरी 2017 तक अफ्रीकी देशों Rwanda और Uganda की यात्रा का सुअवसर मिला।मैं प्रयास करूंगा कि इस यात्रा के किस्सों, इन देशों की खूबसूरती एवं खूबियों से आपको रूबरू कराऊं।फिलहाल शुरुआत जिंजा में महात्मा गांधी की प्रतिमा से।नील नदी के उद्गम स्थल पर 1997 से स्थापित यह प्रतिमा यहां भारतीयता के साथ साथ शांति और सद्भाव की भी परिचायक है। यहां इसकी देखभाल की जिम्मेदारी बैंक आफ बड़ौदा ने संभाल रखी है। खास बात यह है कि यहीं नील नदी के उद्गम स्थल पर महात्मा गांधी की इच्छा के मुताबिक उनकी अस्थियां भीं विसर्जित की गई थी। जिंजा, राजधानी कंपाला से करीब 81किमी दूर है और भारतीय लोगों का गढ़ है। यहां के सबसे धनी लोगों में माधवानी समूह(अभिनेत्री मुमताज वाला),जय मेहता (मिस्टर जूही चावला) और रूपारेलिया समूह है जो तीनों भारतीय हैं।
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Monday, February 13, 2017

सहिष्णुता की खोज (पुस्तक समीक्षा)

       इन दिनों अन्य विधाओं के अलावा व्यंग्य पर ज्यादा काम हो रहा है। यह खबर व्यंग्य यात्रियों के लिए अच्छी हो सकती है, क्योंकि व्यंग्य ही साहित्य में ऐसा धारदार हथियार है जो विसंगतियों, विद्रपताओं को एक झटके में ठीक करने का सामर्थ रखता है । साहित्य में सहिष्णुता की खोज तो पुरातन काल से होती चली आ रही है। सुमित ने भी इस खोज को ऐसे समय जारी रखा जब देश में असहिष्णुता का माहौल निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा था। सुमित ने अपने अभिकथन में लिखा है कि नफे और जिले के काल्पनिक पात्र के माध्यम से खोज जारी रखी। व्यंग्य में ऐसे कथोपकथन वाले पात्रों के माध्यम से चोट करने का अच्छा प्रयास है ।
युवा व्यंग्यकार सुमित ने आधुनिक घटनाओं का समावेश अपने संग्रह में किया है चाहे वह साइबर युग के राजा, एक पत्र साक्षी और सिंधू के नाम, एक पत्र माइकल फेल्प्स के नाम, वायरल होने की चाहत या एक पत्र सन्नी लियाॅन के नाम जैसे एक से बढ़कर एक शीर्षकों के साथ घटित तथ्यों पर कटाक्ष किया है। जिसमें एक पत्र आमिर खान के नाम से तत्समय की परिस्थितियों पर बेबाक व्यंग्य किया है। असहिष्णुता की बात कहकर आमिर खान ने ही विवाद को जन्म दिया था और उनके इस विवाद को लेखक ने बड़ी ही संजीदगी से पकड़ लिया। इसके अतिरिक्त क्षणिक लाभ लेनेवाले बुद्धिजीवियों द्वारा लौटाए जा रहे सम्मान ढकोसले को भी उन्होंने सार्थक रूप से फोकस किया है।
इस व्यंग्य संग्रह में सामाजिक और ऐतिहासिक पात्रों का भी संयोजन किया है कंस का प्रतिशोध, आरक्षण महाराज, सच्ची श्रद्धांजलि, फूफा बनाने की परम्परा अच्छे व्यंग्यों में माने जा सकते है । एक बात और सुमित पक्के पुलिसवाले हैं इसीलिए समाज में घटित होनेवाली किसी भी घटना को उसी निगाह से देखकर वे व्यंग्य के सांचे में ढाल लेते हैं। यह उनका सराहनीय कौशल है। ठीक उसी प्रकार पुलिस समाज की पहरेदार होती है और व्यंग्यकार भी समाज का पहरेदार होता है । सुमित दोनों में सामंजस्य या यूँ कहें कि सहिष्णुता का भाव बनाकर चल रहे हैं। थूकाचाटी, गंदी बात, काश! हम भी सम्मान लौटा पाते, अगले जनम में मोहे ठुल्ला ही कीजो, एक पत्र रायते के नाम, नौकरी बचाव यंत्र, एनकांउटर, भैया आँखों से घर तक छोड़के आओगे आदि मुकम्मल व्यंग्य है। सुमित महानगरीय सभ्यता में विगलित होती परम्पराओं एवं सामाजिक सरोकारों को अपनी पैनी निगाह से पकडने का सार्थक प्रयास कऱ रहे है। जहाँ व्यंग्य में चारित्रिक एवं परिवेश गत परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए लक्ष्य पर चोट की है, वहाँ ऐसे पात्रों को सिवाय मन-मसोसकर रहने के अतिरिक्त और विचार करने के अलावा कुछ नहीं बचता, तभी तो व्यंग्यकार को समाज-सुधारक भी कहा गया है।

पुस्तक : सहिष्णुता की खोज
लेखक: श्री सुमित प्रताप सिंह
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकार, जबलपुर, म.प्र.
प्रकाशक: सी.पी. हाउस, रामा विहार, दिल्ली
पृष्ठ : 119
मूल्य : 160/-

Friday, February 3, 2017

लघुकथा : भांड

जिले ने गंभीर हो नफे से पूछा, "भाई ये भांड किसे कहते हैं?"
"कोई कलाकार जब स्वार्थवश अपनी कला को बेच देता है तो वह भांड बन जाता है।" नफे ने समझाया।
जिले सिर खुजाते हुए बोला, "भाई मैं कुछ समझा नहीं।"
नफे बोला, "जब कोई व्यक्ति कला के प्रति तन-मन से समर्पित हो उसकी समृद्धि में योगदान देता है तो वह कलाकार कहलाता है।"
"और भांड किसे कहते हैं?" जिले ने उत्सुकता से पूछा।
"जब वही कलाकार चंद सिक्कों के लालच में अपनी कला और ज़मीर का सौदा कर लेता है तो..." इससे पहले कि नफे अपनी बात पूरी करता जिले खिलखिलाते हुए बोला, "तो वह भांड कहलाता है।"
 
लेखक : सुमित प्रताप सिंह