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Saturday, May 25, 2013

व्यंग्य: तीसरा बंदर



चित्रगुप्त-  सेवक महात्मा जी को वापिस ले आए?
यमदूत- जी महाराज! जब से वापिस आये हैं, रुंआसे होकर किन्हीं विचारों में खोए हुए हैं।
चित्रगुप्त- भला क्यों?
यमदूत- पृथ्वी लोक पर उनके देश में उन्हें जो दुख व अपमान मिला शायद उन्हें सहन नहीं कर पाये हैं।
चित्रगुप्त- वहाँ पर ऐसा क्या हुआ था?
यमदूत- अपने तीन बंदरों को खोजने के लिए पृथ्वी लोक पर अपने देश में वह दर- दर भटके। जब कहीं नहीं मिले तो थाने गये। वहाँ थानेदार ने उनसे हाथ जोड़कर बंदरों को न खोज पाने के लिए माफी माँग ली व अन्य केसों की अधिकता का बहाना बना दिया।
चित्रगुप्त- थानेदार ने माफी माँगी। पुलिस कब से इतनी कमज़ोर हो गई, जो माफ़ी माँगने लगी? 
यमदूत- असल में थानेदार ने गांधी जी के हाथ में लाठी देख ली थी। उसने समझा कि जनता का कोई प्रतिनिधि है और उसे पीटने आया है।
चित्रगुप्त- (मुस्कुराते हुए) अच्छा फिर क्या हुआ? 
यमदूत- थाने से निकलकर एक जगह सुस्ताते हुए राम नाम का जाप कर रहे थे, तो कुछ लोग जो स्वयं को सेक्युलर बता रहे थे, महात्मा जी के पीछे पड़ गये और उन्हें हिंदू आतंकवादी कहकर वहाँ से भगाकर ही दम लिया।
चित्रगुप्त- हे राम! अच्छा फिर क्या हुआ?
यमदूत- बंदरों को ढूंढते- ढूंढते रास्ते में उन्हें उस पार्टी का दफ्तर दिखा, जिसे उन्होंने नेतृत्व प्रदान कर अपने देश की स्वाधीनता का अभियान छेड़ा था। उन्हें यह देखकर बहुत आघात पहुँचा कि उनके कहने के बावजूद उस पार्टी को भंग नहीं किया गया।
चित्रगुप्त- फिर तो उस पार्टी के सदस्य अपने पूर्व नेता के स्वागत में पलकें बिछा कर खड़े हो गये होंगे।
यमदूत- महाराज अब क्या बतायें। पहले तो चौकीदार ने पार्टी के दफ्तर में घुसने ही नहीं दिया और जब किसी प्रकार महात्मा जी अपना चित्र लगी हुई 500 की मुद्रा का चढ़ावा चढ़ाकर भीतर  गये, तो शीर्ष नेतृत्व से मिलने के लिए उन्हें कई घंटों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।
चित्रगुप्त- ओहो यह तो बहुत दुखद बात हुई। अच्छा शीर्ष नेतृत्व उनसे आकर मिला?
यमदूत- हाँ मिला. लेकिन उसने यह कह कर उन्हें वापिस टरका दिया, कि अब पार्टी को उनकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके नाम से ही पार्टी सत्ता सुख भोग रही है।
चित्रगुप्त- ऐसी बात की। अच्छा छोड़ो ये बताओ उनके तीनों बंदर मिले कि नहीं?
यमदूत- उनके तीन बंदर महात्मा जी के आदेशानुसार कार्य कर रहे थे। पहले बंदर ने बुरा मत देखो पर अमल करके हर बुराई से दृष्टि दूर रखने का लाख प्रयास किया, लेकिन जब उसे समाज में बुराई ही बुराई दिखी तो निराश हो उसने अपनी दोनों आँखों में सुए घोंप लिए। सुओं में जंग लग रखी थी, जिससे उसे  टिटनेस बन गया और बेचारा एक दिन तड़प-तड़पकर मर गया। दूसरा बंदर बुरा न सुनो के वचन पर अडिग रहा और बुरा सुनते- सुनते आखिरकार बहरा हो गया। एक दिन रेल की पटरी पार कर रहा था, बहरा हो जाने के कारण पीछे से आ रही ट्रेन की आवाज नहीं सुन सका और उस ट्रेन से कटकर मर गया।
चित्रगुप्त: (अपना हिसाब-किताब का रजिस्टर खंगालने के पश्चात्) सेवक इन दोनों बंदरों की आत्माएँ यहाँ तक तो पहुँची नहीं।
यमदूत: महाराज! दोनों बंदरों की अकाल मृत्यु होने के कारण उनकी आत्माएँ महात्मा जी के देश में प्रेत बनकर  भटक रही हैं। पहले बंदर की प्रेतात्मा ने कानून को अपने प्रभाव में ले लिया है तथा दूसरे बंदर की प्रेतात्मा सरकार के शरीर में प्रवेश कर गई है और उसे बहरा कर दिया है।
चित्रगुप्त- हे ईश्वर! (कुछ देर के मौन के पश्चात) तीसरे बंदर का क्या हुआ?
यमदूत: तीसरा बंदर अत्यंत चतुर निकला। उसने बुरा मत कहो के वचन को  संशोधित कर लिया। उसने देश में हो अत्याचार व बुरे कार्यों को चुपचाप देखा और सुना, लेकिन इनके बारे में कभी कुछ नहीं बोला और मौन धारण किए रहा। इन दिनों वह चैन की बंशी बजाते हुए अपना जीवन काट रहा है।
चित्रगुप्त- वह तीसरा बंदर अपना जीवन चैन से कहाँ काट रहा है?
यमदूत- आजकल वह महात्मा जी के देश की सत्ता...
चित्रगुप्त- (यमदूत की बात को बीच में ही काटते हुए) आगे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं सेवक। मैं समझ गया।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली