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Wednesday, May 29, 2013

कविता : बेटियां /पत्तियां


पत्तियों का डाली से छूटना आया 
पतझर में जैसे वृक्ष को रोना आया
परिंदों का था ये पत्तियों का पर्दा 
छाँव छूटी और तपिश गहराया |

पत्तियां भी होती बेटियों की तरह 
वृक्ष / घर को ये कर जाती सूना 
रूठ कर करती है जिद्दी फरमाइशें
पिता /वृक्ष कर देते पूरी फरमाइशें |

नई कोपलें फूटने पर कोयल गाती
सूनेपन में फिर से खुशिया छा जाती 
पूजे जाते हैं आज भी वृक्ष और बेटियां 
वृक्ष पर ना करो वार ,ना करो भ्रूण -हत्या |

बेटियां रो - रोकर कह रहीं ईश्वर से 
कब ख़त्म होंगे भ्रूण हत्याओं के पाप 
पर्यावरण / रिश्ते हो जायेंगे जब ख़त्म
दुनिया करने लगेगी तब फिर संताप |

बेटियां और वृक्ष से ही  तो कल है
इनसे ही जीवन जीने का एक - एक पल है 
संकल्प लेना होगा इन्हें बचाने का आज 
दुनिया बचाने का होगा ये ही एक राज |

रचनाकार: संजय वर्मा "दृष्टि "
संपर्क: १ २ ५, शहीद भगत सिंह मार्ग 
मनावर, जिला- धार ( म. प्र. )

चित्र गूगल से साभार