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Monday, March 3, 2014

जीने का इरादा

ज़िन्दगी को ऐसे जीने का इरादा तो नहीं था
किया था खुद से कुछवो वादा तो नहीं था

ऐ खुदा, मांगी थी तुझसे दो ग़ज ज़मीं
अपनों के लिए,
तेरा काबा तो
तुझसे माँगा नहीं था |

मिली हिकारतें, तोहमतें और इलज़ाम
अपनों से मुझे,
सजा काटी उस जुर्म की
जो मैंने किया ही नहीं था |

पैसा कमाने की दोड़ मे मै जाने
कहाँ से कहाँ पहुँच गया,
दूर तलक कोई बेटा, भाई, बाप
कहने वाला नहीं था |

खेत, खलिहान, गाँव की गलियाँ, वो मिट्टी की खुशबू
बहुत याद आती है मुझे,
इन शेहर की आवारा सड़कों पर
जहाँ कोई अपना दिखने वाला नहीं था |

कार , बंगले, टी वी और दोस्तों के
क़र्ज़ उतारे हैं मैंने,
इन हाथों की लकीरों मे माँ का क़र्ज़
उतारना लिखा नहीं था |



रविश 'रवि'



फरीदाबाद