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Wednesday, March 13, 2013

नव्या विवाद: सुश्री शीला डोंगरे का पक्ष

(आज सुबह ही मुझे पंकज त्रिवेदी का मेल मिला। उन्होंने शीला डोंगरे जी पर नव्या को हथियाने का आरोप लगाया था। मैंने शीला डोंगरे से बात की, तो बात कुछ और ही निकली। मेरे हिसाब से हर किसी को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए। अब नव्या पर तो शीला जी अपनी बात रख नहीं सकतीं, सो सादर ब्लॉगस्ते पर शीला जी को अपनी बात रखने का मौका दिया जा रहा है। आप सभी से निवेदन है, कि इस विषय में कृपया अपने-अपने विचार प्रस्तुत करें। धन्यवाद... सुमित प्रताप सिंह )

     'नव्या' के प्रकाशन का निर्णय नासिक के बैठक में ही लिया गया । हाँ ये सत्य है कि 'नव्या' से मै अपनी ख़ुशी से जुडी थी । बल्कि 'नव्या' की प्रिंट पत्रिका मेरा ही निर्णय था ।  मेरी विनम्रता यदि किसी को मेरी कमजोरी लगे, तो उसे कमजोरी और विनम्रता में अंतर बताना मेरा फर्ज था । 
मेरा और श्री पंकज त्रिवेदी जी का परिचय मात्र एक साल पुराना है । 'नव्या' से प्रारम्भ हुई और 'नव्या' पर ही ख़त्म हो गया। मैंने कभी भी किसी को अपनी फ्रेंड लिष्ट से नही निकाला और ना ही कभी जोड़ा । ये जोड़-तोड़ की आदत तो त्रिवेदी जी की है ... । प्रिंट पत्रिका निकलना आसान नही होता बहुत आर्थिक बल की जरुरत होती है । जाहिर सी बात है पैसा घर से ही लगाने थे । पार्टनर होने के नाते हम दोनों ने ही 50%, 50% का जिम्मा उठाया । अगर हम पार्टनर है तो निर्णय भी हम दोनों के सहमती से  होने चाहिए थे । लेकिन पिछले 6 महीने में सरे निर्णय त्रिवेदी जी के रहे । पूछने पर नव्या के हित में कह कर टाला जाने लगा । धीरे धीरे नव्या से मुझे निकाले जाने की साजिश आकार लेने लगी । 'अहिसास' द्वारा लिए गए नासिक के किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम की खबर 'नव्या' इपत्रिका में नही प्रकाशित होती । पूछे जाने पर .. भूल गया जैसे जवाब मिलता । 'नव्या' के अन्य संगी-साथियों को भी इसी प्रकार से निकाला गया था । इसका सीधा सा यही मतलब निकलता है, कि श्री पंकज त्रिवेदी 'नव्या' के नाम से केवल खुद को महिमामंडित कर रहे थे । बिना ये सोचे की उन्होंने जिनके कंधो पर अपना पैर धरा है उनपर बोझ पड़  रहा है । बिना किसी कागजी कार्यवाही के, बिना किसी पार्टनरशिप की डील  किये केवल शाब्दिक विश्वास पर ये सब चलता रहा । लेकिन जब मेरा विश्वास डगमगाने लगा, मैंने लिखित पेपर बनाने की जिद की । पत्रिका को रजिस्टर करने की बात कही ... त्रिवेदी जी ने अपने नाम से रजिस्ट्रेशन फार्म भरा । ये जायज भी था .. और मुझे कोई आपति नहीं थी । सोच यही थी की पार्टनरशिप डील  तो है । अब अगर मै किसी और नाम से पत्रिका का रजिस्ट्रेशन कराती तो क्या होता ...एक झूठे और मक्कार इंसान को फिर शय मिल जाती । इसलिए मैंने 'नव्या' का नाम ही सही समझा । त्रिवेदी जी की तिलमिलाहट तो बस इतनी है कि उनके पास कोई हक़ नहीं रहा 'नव्या' का । अब अगर वाकई 'नव्या' के हित की उन्हें इतनी ही चिंता है तो 'नव्या' का सह सम्पादक पद मै  उन्हें दे सकती हूँ । अगर मैं उनके नाम से रजिस्टर 'नव्या' में काम कर सकती थी और उनकी सहसंपादक बन सकती थी तो वह क्यों नहीं? अब रही गुडविल की बात, तो जहां साथ काम शुरू किया वहाँ गुडविल अकेले त्रिवेदी जी का कैसे हो सकता है? देश भर में कार्यक्रम तो 'अहिसास' की और से ही आयोजित हो रहे थे । तो गुडविल अकेली नव्या का कैसे हुआ ? अब अगर आगे कोई व्यक्ति त्रिवेदी जी से गठबंधन करना चाहे तो पूरी तौर पर क़ानूनी कार्यवाही पूर्ण करे । क्यों की त्रिवेदी जी कहते कुछ है और करते कुछ है ॥ 

                                 

निवेदक: सुश्री शीला डोंगरे


13 comments:

  1. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)March 13, 2013 at 7:53 PM

    शुभकामनाएँ!
    अपनी इगो को ताक पर रख कर पत्रिका चलाइए।

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    1. SheelaMarch 14, 2013 at 12:08 PM

      शुक्रिया डॉ स्वरुपचन्द्र शाश्त्री मयंक जी ....

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  • Kalipad "Prasad"March 13, 2013 at 8:14 PM

    साझा काम में दोनों की सहमती आवश्यक है अहम् नहीं
    latest postउड़ान
    teeno kist eksath"अहम् का गुलाम "

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    1. SheelaMarch 14, 2013 at 12:13 PM

      याहा अहम् नही था .... मुझे तो साजिश ही नजर आई ...!

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  • सरिता भाटियाMarch 13, 2013 at 8:35 PM

    Sumit ji ,pehle to sab kaam written mein hona chahiye partenership mein aur dono ki sahmati to jaruri hai hi ise milkar suljhaiye aur iske pathakon ko pareshani nahi honi chahiye

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    1. SheelaMarch 14, 2013 at 12:17 PM

      सरिता भाटिया जी ... पाठको को कोई परेशानी नही होगी .... 'नव्या' अब त्रेमासिक नही मासिक पत्रिका के रूप में आप पाठको तक पहुचेगी ... धन्यवाद इस स्नहे के लिए

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  • दिलबाग विर्कMarch 13, 2013 at 8:57 PM

    यह प्रविष्टि कल के चर्चा मंच पर है
    धन्यवाद

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    1. SheelaMarch 14, 2013 at 12:18 PM

      दिलबाग विर्क जी ... बहुत आभार आप का

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  • Ratan singh shekhawatMarch 13, 2013 at 9:12 PM

    यह विवाद साफ करता है कि कोई भी कार्य बिना लिखा पढ़ी के नहीं करना चाहिए !!

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    1. SheelaMarch 14, 2013 at 12:21 PM

      रतन सिंग शेखावत जी ... ढूढ का जला इंसान छाछ भी फूंक कर पीना सिख जाता है

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  • poonam matiaMarch 13, 2013 at 9:55 PM

    :)

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  • दिनेश पारीकMarch 14, 2013 at 9:00 PM

    श्री सुशीला डोंगरे जी नमस्कार.
    मैंने आपके पक्ष से पहले पंकज जी के पक्ष को पढ़ा देखा समझा था और आज अभी और इस वक्त आपके पक्ष को समझने को कोशिस कर रहा हूँ बस आप से गिजरिस करता हूँ की इस पोस्ट को आप मुझे ईमेल कर दे पर इस से पहले आप पंकज जी के पक्ष को जरुर पढ़ लेवे मेरे ब्लॉग पर मैं चाहता हूँ की दोनों पक्ष की बात सुनी जावे और समझी जावे मैं अपना ब्लॉग लिंक दे रहा हूँ और अपना ईमेल भी दे रहा हूँ.
    [email protected]
    http://dineshpareek19.blogspot.in/
    दिनेश पारीक

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  • SheelaMarch 15, 2013 at 1:28 PM

    सादर प्रणाम ..दिनेश पारीख जी ...मैंने ओलोकन के लिए डाली है आपके ब्लॉग पर भी अपनी पोस्ट ... and thanks for this secular approach

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सुमित प्रताप सिंह,
संपादक- सादर ब्लॉगस्ते!