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Thursday, August 30, 2012

फाँसी के फंदे के नाम एक खत



प्यारे फाँसी के फंदे

सादर निठल्लस्ते!

    मेरे द्वारा इस प्रकार संबोधित करने पर आपको कष्ट तो बहुत हो रहा होगा, किन्तु आप ही बताइए, कि आप इतने दिनों से निठल्ले नहीं हैं, तो क्या कर्मशील हैं. वैसे आज आपके लिए प्रसन्नता का दिन माना जा सकता है, क्योंकि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अजमल कसाब की फाँसी की सज़ा पर अपनी मुहर जो लगा थी. देशभर में देशभक्त जश्न मना रहे हैं और उनके संग आपका मन भी खुशी से बल्ले-बल्ले कर रहा होगा. इस कुछ पल की खुशी पर हम सभी भारतवासियों का अधिकार बनता ही है. हालाँकि हमारी तरह आप भी यह भली-भाँति जानते ही होंगे, कसाब को अपना दामाद मानने वाले उसे बचाने के लिए अपना दिमागी यंत्र घिसना आरंभ कर चुके होंगे. मेरे इन बातों से आपको थोड़ी उदासी तो अवश्य हुई होगी, जो सच है उसे नकारा तो नहीं जा सकता. अरे आपके शरीर में ढीलापन फिर से आने लगा. क्या करें ढीलापन आना अवश्यंभावी है. इतने दिन हो गए किन्तु किसी अपराधी की गर्दन को कसने का आपको मौका ही नहीं मिला. छब्बीस करोड़ खर्च कर करीब चार साल ऐश करवाने के बाद कसाब आपसे मिलने के लिए तैयार करवाया गया. किन्तु आप दिवा स्वप्न देखते रहिए और कसाब की गर्दन से भेंट करने प्रतीक्षा में यूँ ही लटके रहिए. अभी तो पुनर्विचार याचिका, क्यूरेटिव याचिका एवं राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका लगनी बाकी हैं. इन सबके निपटारे में जाने कितना वक़्त लग जाए. आपने पहले भी अफज़ल की गर्दन तोड़ने के सुनहरे स्वप्न देखे थे, आपको क्या फल मिला प्रतीक्षा, प्रतीक्षा और प्रतीक्षा ही न. अब आप इस सत्य को स्वीकार कर ही लीजिए, कि आपके भाग्य में आतंकियों की गर्दनों से मिलना नहीं, केवल प्रतीक्षा ही है. वैसे भी यदि आतंकियों को इस देश में फाँसी की सज़ा मिलने लगी तो उनका वोट बैंक बंद नहीं हो जाएगा और यदि उनका वोट बैंक बंद हो गया, तो उनके राजनीति नामक व्यापार डूब न जाएगा. खैर आप अपने शरीर को इतना भी ढीला न छोड़ें और समय-समय पर इसमें मालिश इत्यादि करवाते रहें, क्योंकि आने वाले समय में एक दिन ऐसा भी आएगा, जब आपको लोकतंत्र की गर्दन को अपनी जकड़ से तोड़ने का सौभाग्य मिले.
आप जल्दी से आतंकियों की गर्दन नापें.

इसी कामना के साथ अकड़ा-जकड़ा नमस्कार

आपकी प्रतीक्षा से व्यथित



एक आम भारतीय