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सावधान! पुलिस मंच पर है

Friday, July 5, 2013

बादल फटे पर जीवन बचे


बादल फटा
हुआ ऐसा विनाश
जीवन घटा

प्रश्न यह है कि बादल आखिर फटते क्यों हैं? हिमाचल व उत्तराखंड में बादल के फटने एवं विनाशकारी तबाही के पीछे आख़िरकार वजह क्या है? कहीं यह प्रकृति द्वारा मानवीय अत्याचारों को करारा जवाब तो नहीं? मानव ने विकास के नाम पर जो पर्यावरण के साथ खिलवाड़ किया है, वह किसी से छिपा नहीं है। पहाड़ों को निर्माण का नाम देकर कंक्रीट के जंगलों से भरा जा रहा है। अंधाधुंध निर्माण ने पहाड़ों को चैन की साँस लेना दूभर कर दिया है। अंग्रेजों द्वारा पहाड़ों पर लगाये गए चीड़ के पेड़ चीख-चीखकर कह रहे हैं, कि पहाड़ों को उनकी नहीं अखरोट के पेड़ों की जरूरत है। अखरोट के पेड़ ही पानी को रोकने की क्षमता रखते हैं, न कि चीड़ के पेड़। बादल फटने से अचानक एक साथ गिरने वाले बारिश के पानी को अगर पहाड़ सहन कर ले, तो कोई समस्या ही नहीं है। उसे कोई विशेष नुकसान नहीं पहुँचेगा, लेकिन जब बेचारा पहाड़ ही कमजोर हो तो उस पानी को भला कैसे सह पाएगा। जब पहाड़ इसको सहन नहीं कर पाता है, तो यह कारण बन जाता है आपदा का। जब अधिक मात्रा में पेड़ लगे होंगे, तो पानी पेड़ों की जड़ों के माध्यम से पहाड़ के अंदर एक्वीफर नामक तालाब में जाकर समा जाएगा और यदि पेड़ ही कमजोर होंगे तो वे पत्थरों के साथ टूटकर नदी में जा गिरेंगे और क्रोधित नदी इन पेड़ और पत्थर रुपी हथियारों के साथ कहर ढाएगी तथा  इसके रास्ते में जो भी आयेगा वो ध्वस्त हो जाएगा। विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से विस्फोट कर-करके पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है। पहाड़ों के एक्वीफर नष्ट हो रहे हैं, पेड़ दुर्बल हो रहे हैं। फलस्वरूप जब भी बादल फटते हैं, तो जर्जर पहाड़ भी टूट-फूटकर गिर जाते हैं और परिणामस्वरूप विनाश और तबाही होती है। इस विनाश और तबाही के लिए जिम्मेवार है धन लोलुप प्रशासन, जो पहाड़ों पर अवैध खनन, अतिक्रमण और जल विद्युत परियोजनाओं की अनुमति देता है। सिर्फ अधिक से अधिक घूस के लालच में।

कुछेक का मानना है, कि यह ईश्वरीय आपदा है और ईश्वर ने पापियों को दंड देने के लिए यह सब किया है। ऐसा हो भी सकता है। हर तीर्थ स्थान पर, फिर चाहे वो किसी भी धर्म का हो, तीर्थ यात्रियों को लूटने के लिए व्यापारी के छद्म वेश में लुटेरे बसे हुए हैं, जो देखने में तो भोले लगते हैं, लेकिन असल में वे पैने भाले हैं। अब ईश्वर कब तक शांत रहता? ईश्वर ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया, लेकिन उसके क्रोध के सागर में बह गए बेचारे निर्दोष  लोग। इन लुटेरों का नीचपन तब देखने में आया, जब उन्होंने विपदा झेल रहे लाचारों से चाय, पानी और भोजन सामग्री के लिए औने-पौने दाम वसूले। मृत लोगों के शरीर से गहने नोंच लिए गए। महिलाओं और किशोरियों के मुर्दा जिस्म से दुराचार किया गया। उनसे भी नीच हैं वे सब जो ऐसे समय में राजनीति की पहलो-दुग्गो खेलकर देश का माहौल दूषित करने में लगे हुए हैं। बहरहाल इस त्रासदी से तो देश कुछ दिन में उबर जाएगा. हालाँकि यह कठिन कार्य है। फिर भी ऐसी विपदा फिर न आए, इसके लिए हमें जागना ही पड़ेगा और सोये हुए प्रशासन को भी जगाना होगा। वरना किसी दिन प्रकृति अपने महा रौद्र रूप में आ गई, तो इस देश को समुद्र में विलीन होने में मात्र कुछ क्षण ही लगेंगे।  

सुमित प्रताप सिंह