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Thursday, December 6, 2012

शोभना काव्य सृजन पुरस्कार प्रविष्टि संख्या - 6


विषय: आतंकवाद

जाने कैसा दौर गुज़र रहा है ये ,
खुदा का घर दहशत में है
जन्नत लिपटी पड़ी  है नुकीले तारों में
खूब चलता है व्यापार इन दिनों नुकीली तारों का |
बर्फ की चादर अब तो मैली हो चली है
खून के धब्बों से ,
जख्मी हो गए हैं
बन्दूक की नोक पर कदम रखती
ज़िन्दगी के तलवे भी ,
चल नहीं सकती रेंगा करती है अब |
सिर्फ झीलें ही नहीं जमती
स्याह मौसम ने आँखों के सागर भी जमा दिए हैं
दर्द बरसते हैं , आंसू नहीं |
अज़ानों की जगह अब
गोलियों की चीखों ने ले ली है ,
सर झुकाते ही इबादत में
पैरों के नीचे से ज़मीन खींच लेते हैं |
चुपचाप देखते रहते हो...
अपने बनाए स्वर्ग को
तब्दील होते नर्क में ,
या खुदा ! क्या तेरा दिल भी पत्थर का हो गया है ?

रचनाकार - श्री वीरेन्द्र जैन 


वड़ोदरा , गुजरात