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Thursday, January 24, 2013

शोभना काव्य सृजन पुरस्कार प्रविष्टि संख्या - 26

विषय: नारी शोषण 

सोचती हूं धीरे चलूँ
शायद गली के किनारे पर 
कोई कह न बैठे,

"कैसी बेहया है। देखो कितना तेज चलती है

ढीले कपड़े पहनूं तो ऐसे उड़ जाते है 

तो भी डर लगता है 
कि कोई कह न बैठे 
कैसे कपड़े पहनती है?”
तंग कपड़ों में कसे तन पर 
जब देखती हूं दूसरों की नज़रों को 
जो कहते हैं देखो कैसे तंग कपड़े पहनती है?” 
और जब धीरे चलूँ तो 
डर सा लगता है कि 
कोई पकड़ न ले
कोई जबरन अपना शिकार न बना ले.
खुद की बदनामी होगी 
अगर कोई मुझको छुएगा,
गली की होगी बदनामी क्योंकि 
ये गली वालों की मर्दानगी पर वार होगा
किसी भी मोड पर चलते चलते 
आजकल सहम जाती हूं
खुद ही में सिमट जाती हूं
खुद को आधुनिक कहने वालों से 
बहुत कतराती हूं मैं,
दोहरे मापदंडों में कहीं न कहीं 
फंस जाती हूँ मैं,
किसी को भी मदद के लिए 
बुला नहीं पाती हूं मैं
अनसुलझे सवालों से रोज ही 
घिर जाती हूं मैं,
लाख कोशिश करती हूं
दिमाग को भी मथती हूं,
लेकिन इस सवाल का 
उत्तर नहीं मिल पाता है,
कि क्यों नारी को ही 
हर हालत में उसकी दुर्दशा का,
उत्तरदायी ठहराया जाता है
क्यों उसको ही हर बार 
गलत ठहराया जाता है?
शायद इसका उत्तर 
हमारी सोच में कहीं छिपा हुआ है,
देव और दानव का भाव 
हमारे मन में बसा हुआ है 
सत्य यही है कि नारी का 
जब जब अपमान हुआ है,
पतन हुआ है 
उस जाति का और 
भयंकर विनाश हुआ है.



रचनाकार: सुश्री सोनाली मिश्रा 



साहिबाबाद, उत्तर प्रदेश