सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।

सावधान! पुलिस मंच पर है

Friday, June 7, 2013

कविता: मैं और मेरी नींद

तमाम रात यूँ ही गुजर गयी
आँखों को पलकों पर बैठाये हुए
न मैंने उसकी तरफ देखा
न उसने ही मेरी तरफ नज़र फिराई
हालाँकि हम दोनों थे साथ-साथ लेटे
उसे मेरी
और
मुझे थी उसकी
जरुरत
फिर भी न जाने क्यों ?
वो छोटा सा फासला
पूरी रात तय न हो सका
देखता रहा मै यूँ ही छत को
और निहारती रही वो भी दीवारों को
न मुझे कुछ हासिल होना था
न उसे ही कुछ मिलना था
 न उसने कोई ज़हमत उठाई
और न मैंने ही कोई दिलचस्पी दिखाई
उसको थी चाहत
मैं उसे पुकारूँ
और मैं
करता रहा उसका इंतज़ार
हम दोनों यूँ ही लेटे रहे
तमाम रात.....एक ही बिस्तर पर
 मैं
और 

मेरी नींद।   
रविश ‘रवि’
फरीदाबाद, हरियाणा