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Saturday, August 10, 2013

व्यंग्य: कवियित्री का दुःख


   वियित्री जी इन दिनों बहुत दुखी हैं. हालाँकि उन्हें प्रसन्न होना चाहिए, क्योंकि अभी कुछ ही दिन तो बीते हैं उनकी किताब का विमोचन हुए. कितना भव्य कार्यक्रम था. उनके मित्रों और सगे-सम्बन्धियों ने पूरी तन्मयता से पुस्तक विमोचन समारोह में अपना  योगदान दिया और इसे सफलता के सोपान पर पहुँचाया. उनकी पुस्तक की चर्चा विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं व लेखक वर्ग की बीच खूब हुई थी. फिर भी वो दुखी हैं तो यह सोचने वाली बात है. उनका मन कुरेदने पर ही पता चलेगा, कि  आखिर वो दुखी क्यों हैं. अच्छा तो ये मामला है, जिसके कारण उन्हें इतना दुःख झेलना पड़ा है. उन्होंने इतने जतन से अपनी रचनाओं को पाल-पोसकर बड़ा किया था. उनमें अपना सारा लाड़-प्यार उड़ेल दिया था, लेकिन उस दिन पुस्तक विमोचन समारोह में उनकी सहेली ने उनका दिल तोड़ दिया. उनकी प्रतिनिधि कविता को उनकी सहेली ने थोड़ा-बहुत संशोधित करके कार्यक्रम में सुना दिया और श्रोतागणों को सुला दिया. हालाँकि असल की नकल में दम नहीं था, फिर कवियित्री को इस बात का गम हो गया, कि कहीं लोग नकल को असल और असल को नकल न समझ लें. उन्हें अपनी सहेली पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन सहेलीपन को निभाने की खातिर चुपचाप यह सब सहती रहीं. हो सकता वो अपनी सहेली से इसलिए बैर न लेना चाहती हों, क्योंकि उनकी सहेली उनसे ज्यादा चर्चित है. अब ये और बात है कि सहेली अपनी पकाऊ रचनाओं के कारण चर्चा बटोरती रहती हैं. ऐसी बात नहीं है इस देश में अच्छी और स्तरीय रचनाओं के ही चाहनेवाले हैं. पकाऊ रचनाओं का भी अपना एक अलग पाठक वर्ग है और इस पाठक वर्ग की कृपा से ही पकाऊ लेखक पकाऊ रचनाओं का सृजन करते जा रहे हैं. अपने उत्साह को भंग होने से बचाने के लिए पकाऊ लेखकों ने अपना अलग पकाऊ गैंग बना रखा है, जो एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़कर और सुनकर वाह-वाह करता रहता है और एक-दूसरे को तुष्ट करता रहता है. कवियित्री जी ये सब भली-भांति जानती हैं, फिर भी दुःख तो दुःख है. एक बार किसी के हृदय में पैठ बना ले, तो बड़ी कठिनाई से ही निकलता है. यही कुछ कवियित्री जी के साथ हुआ है. अब वो सोच रही हैं, कि इस बात को लेखक वर्ग के बीच उठाया जाए अथवा नहीं. रचनाएँ चोरी करना वैसे भी आजकल लेखकों के बीच फैशन सा बन गया है. उन्हें इस बात का भी डर है, कि यदि इस बात को लेखक समुदाय के बीच वो उठाती हैं तो कहीं लेखक भाई-बहन लोग उन्हें झिडक न दें, क्योंकि ऐसी घटनाओं को सुनते-सुनते वे सब पहले ही बहुत पक चुके हैं और अब यदि वो भी अपना रोना रोयेंगी तो पक्का वे सब भी उनके साथ-साथ रोने लगेंगे. हो सकता है कुछ लेखक इस बात से चिड़ जाएँ कि उनकी रचना की ही क्यों नकल मारी गई, क्या उन सबकी रचनायें इस लायक नहीं थीं, कि उनकी नकल अथवा चोरी न की जा सके, जबकि उन्होंने खुलेआम घोषणा कर रखी है, कि कोई भी उनकी रचनाओं की नकल व चोरी कर सकता है. फिर भी उनकी एक भी रचना किसी ने चोरी नहीं की. इसका अर्थ है कि उनकी रचनाओं में दम नहीं था और कवियित्री जी रचना की सरेआम नकल मार ली गई. मतलब कि उनकी रचना में... अब शायद कवियित्री जी के कुछ-कुछ समझ में आ रहा है और उनका दुःख धीमे-धीमे उड़न-छू हो रहा है तथा उनके चेहरे पर हल्की-हल्की मुस्कान दिख रही है. उसी मुस्कान में वो अपनी उस सहेली को धन्यवाद दे रही हैं, कि उनकी सहेली ने उनको बड़ी लेखिका बना दिया. अब कवियित्री जी सभी लेखक-लेखिकाओं को खुला निमंत्रण दे रही हैं, कि वे आएँ और उनकी रचनाओं को निसंकोच उड़ायें. लेखक समुदाय भी प्रसन्नता अनुभव कर रहा है, कि चलो कवियित्री जी का दुःख तो समाप्त हुआ. 

सुमित प्रताप सिंह


इटावा, दिल्ली, भारत 

*चित्र गूगल बाबा से साभार*