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Saturday, March 16, 2013

व्यंग्य: मुआवजा


    न दिनों एक शब्द बहुत  चर्चित हो रखा है. इससे पहले आप अपने दिमाग पर सोचने के लिए जोर डालें, चलिए मैं ही बता देता हूँ, कि वह शब्द है मुआवजा. वैसे यह शब्द कोई नया-नया नहीं उपजा है. इसका भारतवासियों से संबंध बहुत पुराना और घनिष्ठ है. किसी दुर्घटना की भरपाई करने का इकलौता अचूक साधन है मुआवजा. हालाँकि बहुत कम खुशनसीब होते हैं, जिन्हें मुआवजा पाने का सौभाग्य मिल पाता है. इसे पाने के लिए मुंगेरी लाल की तरह हसीन सपने देखते हुए कुछ  बेचारे चक्कर  पे चक्कर काटते रहते हैं और घनचक्कर बन जाते हैं. उनका मुआवजा फ़ाइल के भीतर छुपा हुआ इस टेबल से उस टेबल की सैर करता रहता है और मुआवजा पाने की आस लिए हुए ही वे बेचारे परमधाम की सैर को चल पड़ते हैं. अपना मुआवजा हासिल वही कर पाता है, जो इसे पाने का जिगरा लेकर पैदा होता है और गरीब और लाचार लोगों को ईश्वर ऐसा जिगरा देकर भेजता ही नहीं है. फिर भी कुछ लोग बड़े मेहनती और हिम्मती होते हैं और अपनी मेहनत और हिम्मत के बल पर मुआवजा वसूल कर ही लेते हैं, लेकिन उनका मुआवजा जब उनके हाथ में आता है, तो उन्हें निराशा के सिवा कुछ हासिल नहीं होता क्योंकि पहाड़ के आकार का मुआवजा उनतक पहुँचते-पहुँचते मिट्टी का छोटा डेला बन जाता है. हालाँकि ऐसा नहीं है, कि मुआवजे से किसी का भला नहीं होता है. मुआवजा दिलवाने वाले विभाग के कर्मचारियों और बिचौलिओं की बढ़ती जाती तोंदों से आप अनुमान लगा सकते हैं, कि मुआवजे ने उन सबकी सेहत में कितना इजाफा किया है. अपनी-अपनी किस्मत है, कि मुआवजे का कितना हिस्सा किसके हिस्से में आता है. कोई पूरा मुआवजा पा लेता है, तो किसी को आधा मुआवजा ही मिल पाता है, तो किसी को मिलता है ठन-ठन गोपाल. हाँ यदि अगर आप एक विशेष वर्ग या समुदाय से संबंध रखते हैं, जिसका वोट बैंक भी जबरदस्त है, तो आपको बिन माँगे  ही पाँच गुना मुआवजा मिल सकता है और अगर आप आठ गुना मुआवजा पाने की फरमाइश भी करेंगे, तो मुआवजा अपना आकार बढ़ा कर आठ गुना होकर आपकी बाँहों में आने को खुशी-खुशी तैयार हो जाएगा. आठ गुना होना उस बेचारे की मजबूरी होगा, क्योंकि देश के संसाधनों पर पहला हक तो इस वर्ग का ही माना गया है. देखिए मेरी बात को मजाक में बिल्कुल न लें. अरे भाई मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ. अपने देश के मुखिया ने इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है. तो मेरी बात पर गौर फरमाइएगा. ईश्वर न करे लेकिन अगर कभी आपके साथ कोई दुर्घटना हो जाए और आपको पूरा मुआवजा पाना हो, तो इस वोट बैंक में शामिल हो जाइएगा या फिर अपना एक अलग वोट बैंक बना डालिएगा. फिर देखते हैं ई ससुरे मुआवजे को. 
व्यंग्यकार: सुमित प्रताप सिंह

इटावा, दिल्ली, भारत