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Sunday, July 22, 2012

क्या किसानों और बच्चों की मौत पर विकास चाहते हैं हम


 मारे देश में रोजगार के अवसरों में भी लगातार इजाफा हुआ है.सरकार लगातार अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दे रही है.फिर भी देश में गरीबी और बेरोजगारी में कोई बदलाव क्यों नज़र नहीं आता.भारत जैसे विकासशील देश में हर साल २५ लाख शिशु अकाल मृत्यु की भेंट चढ जाते है.तक़रीबन २२ करोड़ लोग आज भी भूखे पेट सोते है. आज हम यह सोचने को मजबूर है.कि यह आंकड़े क्या वाकई हमारी प्रगति को दर्शाते है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ६०% जनता कृषि को व्यवसाय के तौर पर अपनाये है.जो किसान सारे देश की भूख मिटते है.क्या उन्हें भर पेट खाना मिलता.शायद नहीं.                                                                     

 आज हम किस प्रगति को मापदंड मान रहे है.भुखमरी से पांच साल से कम आयु के पांच करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार है.केंद्र सरकार गरीबी दूर करने के लिए योजनाओं का अम्बार हर वर्ष लगाती है.पर फिर वही ढाक के तीन पात ही रह जाता है जहाँ एक ओर धनी देश १० से २० फीसदी आमदनी भोजन पर खर्च करते है.वही हमारे देश में गरीबी के कारण  ५५% हमारे देश में संसाधनों की कोई कमी नहीं है,,तकनीकी कौशल का कोई अभाव नहीं कमाई का हिस्सा भोजन पर खर्च हो जाता है.अर्थव्यवस्था की चमक केवल मेट्रो सिटी में ही सिमट कर रह गयी है.जब हर बजट में देश की सभी आवश्यक जरूरतों पर खर्च करने के लिए निश्चित भाग तय होता है.परन्तु हम उस भाग को पूर्णतः उस काम में नहीं लगाते क्योंकि वो हिस्सा भ्रष्टाचार की बलि चढ जाता है.आज भ्रष्टाचार हमारे समाज को दीमक की तरह खोखला कर रहा है.जिसमे नेता मंत्री ओर नौकरशाह सभी लिप्त है सभी केवल अपनी स्वार्थ की रोटियां सेकने में लगे है.जिसकी वजह से किसानों ने आत्महत्या जैसा संगीन कदम उठाना शुरू  कर दिया है                                                                                                                                                                                                                                                                                       आज वो अपने खेत में अनाज उगाने के लिए सरकार की ओर मदद के लिए आशाभरी निगाहों से देखते है पर जब निराशा ही हाथ लगाती है तो उनके पास बैंक या साहूकार के पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं मिलता.वे बैंक और साहूकार से क़र्ज़ लेकर अच्छी पैदावार की उम्मीद करते है.पर उम्मीद के अनुरूप उत्पादन होने  पर उन्हें क़र्ज़ चुकाने की चिंता होने लगती है. क़र्ज़ चुका पाने की सूरत में आसान तरीका आत्महत्या ही नज़र आता है.वैसे २०११-१२ के बजट में किसानों को रियायत देने की कोशिश है.इस रियायत से किसानों की मुश्किलें कम होगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.पर हमें हमारे देश को समस्याओं का घर बनने से बचाने के लिए सार्थक प्रयास की दरकार है.भ्रष्टाचार विरोधी कानून बना देने से सरकार की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती है.बल्कि उसे लागू करने में भी पूरी ईमानदारी से कदम उठाने की जरुरत है.

   आज समाज में अन्ना हजारे जैसे देशभक्तों के अनशन जैसे प्रयास. नाकाफी है. इस आन्दोलन को समर्थन देने से काम नहीं चलने वाला बल्कि उनके द्वारा तैयार कराये लोकपाल बिल के प्रारूप के निर्माण में रही मुश्किलों को दूर करने में एकजुट हो कर प्रयास होना चाहिए.वैसे अन्ना हजारे ने अपना अनशन एक बार फिर शुरू कंरने की तैयारी कर ली है. अगर अब भी सरकार इस बिल के बारे में कोई आनाकानी करती है.तो देशव्यापी आंदोलन को लगातार जारी रखने का माहौल तैयार हुआ है.अब देखनेवाली बात यह है कि सरकार इस बिल को लेकर कहाँ तक सार्थक कदम उठाती है.और देश में भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाकर देश में नयी उर्जा का संचार करती है. या एक बार फिर केवल चुनावी आश्वासनों की तरह यह बिल भी ठन्डे बस्ते में चला जायेगा पर इसकी जगह सरकारी तंत्र में भी आमूल परिवर्तन को नकारा नहीं जा सकता.तभी देश भ्रष्टाचार से पूर्ण मुक्ति पा सकेगा...........