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Monday, July 16, 2012

समीक्षा : इस रात की सुबह कब होगी?



       इस रात की सुबह कब होगी? नामक उपन्यास के लेखक सुरेन्द्र 'पीलवान' ने पाठकों के समक्ष एक आश्चर्य से भरी हुई कहानी प्रस्तुत की है. प्रत्येक मनुष्य इस संसार में विचित्र अनुभवों के दौर से कभी न कभी गुजरता ही है. कहानी का मुख्य पात्र अशोक जो कि अपने गुरु व ईश्वर के प्रति गहरी श्रद्धा रखता है. जब उसका विचित्र अनुभवों से सामना होता है तो उसका विश्वास डगमगाने लगता है. अन्य पात्र रजनी जो कि अशोक की पत्नी है कहीं न कहीं मन को प्रभावित करती है. अशोक ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए सत्संगों का सहारा लेता है, वहीं रजनी गुरु की भक्ति से ज्यादा कर्म की प्रधानता पर बल देती है, वह भारतीय नारी के आदर्शों को मन में संजोये हुए, हर तरह की मुसीबत में अपने पति का तन-मन से सहयोग करती है. दूसरी ओर उपन्यास की अन्य पात्र चित्रलेखा जोकि अशोक की धर्म की बहन है सत्संग भजन कीर्तन में मग्न रहती है. उसकी भक्ति के नाटक के पीछे उसका व्याभिचारी रूप सहसा आश्चर्य में डाल देता है, कि किस प्रकार कुछ विक्षिप्त मानसिकता के लोग समाज में सीधा बनने के लिए भक्ति का ढोंग करते है.
अशोक का सपना है कि उसका भी अपना एक घर हो जब वह घर बनवाता है तो छोटी-मोटी  हर एक बात का ध्यान रखता है कि उसके घर में कोई भी अशुभ-अमंगल न हो. वह अपने परिवार के साथ वहां रहने लगता है व सारे शुभ कार्य पूजा-पाठ करवाता है, ताकि उसका परिवार इस घर में सुख-चैन का जीवन बिता सके किन्तु फिर भी उसके घर में विपदाओं का पहाड़ टूट पड़ता है. वह और उसका परिवार शैतानी शक्तियों के चंगुल में धीरे-धीरे फंसते जाते है. अशोक के मन-मस्तिष्क पर यह शक्तियाँ अपना अधिकार जमा लेती है. अशोक अपनी समस्या का समाधान पाने के लिए संत-सन्यासियों, तांत्रिकों-ज्योतिषियों, मुल्ला-मौलवियों व सूफियों इत्यादि के पास भटकता है पर हर तरफ से उसे निराशा ही हाथ लगती है. सब ऐसी परिस्थिति में डूबते को सहारा देने की बजाय उससे रूपए ऐंठते है. धीरे-धीरे उसका ईश्वर व अपने सत्संगी गुरु से विश्वास उठ जाता है. अब वह अपनी अन्तरआत्मा को ही अपना सच्चा गुरु, रक्षक व हितैषी मानने लगता है. धीमे-धीमे उसकी आर्थिक स्थिति भी जबाव देने लग जाती है. आखिरकार हारकर उसे अपने परिवार के हित के लिए अपने पुराने मकान में वापस लौटना पड़ता है. 
उपन्यास में शुरू से लेकर आखिर तक लेखक ने रोचकता बनाए रखी है. लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से संत सन्यासियों, तांत्रिकों-ज्योतिषियों, मुल्ला-मौलवियों व सूफियों आदि की पोल खोली है जो लोगों को मूर्ख बनाकर समस्या का समाधान करने का आश्वासन देकर रूपए ऐंठते हैं. साधक जी का यह पहला उपन्यास है और मेरे अनुसार वह  अपने लेखन में काफी सफल रहे है. इस उपन्यास में नीरसता का बिल्कुल अभाव है और रोचकता आरंभ से अंत तक बनी रहती है. किन्तु उपन्यास में एक कमी खटकती है कि उपन्यास का अंत अधूरा सा लगता है. हो सकता है कि लेखक का इस उपन्यास का दूसरा भाग लाने का विचार हो. यदि ऐसा है तो दूसरा भाग पढ़ने की उत्सुकता व प्रतीक्षा रहेगी.  

समीक्षाकार- संगीता सिंह तोमर 

पुस्तक का नाम - इस रात की सुबह कब होगी 
प्रकाशक - पूनम प्रकाशन 
        6- बी, गली नं. 1,
        कौशिक पुरी, पुराना सीलमपुर,
        दिल्ली - 110031
पुस्तक का मूल्य - 225/- रुपये