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Thursday, May 30, 2013

कविता: अज्ञान तिमिर

आकंठ डूबे हुये हो क्यों,
अज्ञान तिमिर गहराता है।
ये तेरा ये मेरा क्यों ,
दिन ढलता जाता है।
क्यों सोई अलसाई  अंखियाँ,
न प्रकाश पुंज दिखाता है ।
जीवन मरण का फंदा ,
आ गलमाल बन लहराता है।
तब क्यों रोते हो,
जब सब छिनता जाता है।
नूतन खोलो ज्ञान चक्षु औ,
हटा दो तिमिर घनेरा।
फैले  पुंज प्रकाश का ,
होवे  दर्शन नयनाभिराम।
                
 अन्नपूर्णा वाजपेयी
कानपुर, उत्तर प्रदेश