सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।

सावधान! पुलिस मंच पर है

Friday, February 1, 2013

शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 4

नारी तुम स्वतंत्र हो

सुबह से शाम तक 
चक्कर घिन्नी सी घूमती 
 कभी आँगन से गुसल तक  
 कभी चौके से  देहरी तक 
 कभी हाथ में  जुराब लिए 
 कभी आटे  में हाथ  सने 

 कभी चाय की पुकार 
 कभी कमरे की बुहार 
कभी बस की  रफ़्तार 
 बॉस के तानो की बौछार 
 सुबह से शाम तक 
चक्कर घिन्नी सी घूमती 

 कभी माँ का दायरा 
 कभी पति का हक 
 कभी बहु का कर्तव्य 
 कभी दफ्तर का लक 
 सुबह से शाम तक 
चक्कर घिन्नी सी घूमती 


 नारी !!!तुम कितनी भी
 आधुनिक हो जाओ 

 क्या तुम स्वतंत्र हो ?
 अपने ही बनाये 
दायरों से !
 संस्कारों से !!
व्यवहारों से !!
 लोकाचारो से !!

रचनाकार: सुश्री नीलिमा शर्मा

देहरादून, उत्तराखंड