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Tuesday, January 8, 2013

शोभना काव्य सृजन पुरस्कार प्रविष्टि संख्या - 21

विषय: भ्रष्टाचार

भारतीय राजनीति के 
पानी में
मजे ले रही 
लोट लगा रही
जुगाली कर रही
भ्रष्टाचार की 
मरखनीकाली
भैंस। 

चरवाहा खड़ा
बाहर असहाय
कर रहा
विफल प्रयास
उसे बाहर निकालने का। 

चर जाती यह
नैतिकताईमानदारी की
हरी घास 
चट कर जाती
देश - प्रेमनिष्ठा का 
भूसा। 

हर ओर मुँह मारती
सब कुछ को खाती 
मोटी होती जाती
यह भ्रष्टाचार की
मरखनीकाली
भैंस। 

झूठ - फरेब के 
बड़े - बड़े सींग 
पटकनी देती
अपने ही मालिक को 
कानून सी 
लंबी पूँछ
मक्खियाँ उड़ाती। 

फर्जी खातों से थन
कितना भी खींचो
निकले न दुग्ध-कण
फिर भी देश के 
हर कोने में 
छा रही
फलती-फूलती 
जा रही 
यह भ्रष्टाचार की
मरखनीकाली
भैंस।

रचनाकार: डॉ. रवि शर्मा 'मधुप'
श्री कॉलेज ऑफ कॉमर्सदिल्ली