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Sunday, September 27, 2015

कविता : खूनी दरवाजा



दिल्ली गेट के पास
इतिहास के दुःख भरे पलों को 
अपने सीने में दबाए
उदास गुमसुम सा
खड़ा है खूनी दरवाजा
जब भी सुनता है 
कोई अनजान सी आहट तो
हो उठता है चौकन्ना
और अपने विशाल शरीर को 
कड़ा कर मजबूत करने लगता है
कुछ देर बाद 
अपने इस प्रयास में 
असफल होने पर
सुबकने लगता है खूनी दरवाजा
उसे अचानक याद आते हैं वो क्षण 
जब आजादी की चाह में
बादशाह ने फूँका था
विद्रोह का बिगुल
बदले में बादशाह ने
पाया था निर्वासन
और उसके शहजादों को
इसी दरवाजे पर 
सरेआम भून दिया था
सफ़ेद शैतानों ने गोलियों से
उन हत्यारे पलों को 
याद करते हुए
खूनी दरवाजा बेबसी से
तड़पने लगता है
फिर अचानक गर्वित हो
खड़ा हो जाता है तन कर
और माँग करता है कि
जब बदल दिए गए
कई शहरों, सड़कों और 
मोहल्लों के नाम 
तो क्यों न 
उसका भी नाम बदला जाये
और खूनी दरवाजा में 
दरवाजे को ज्यों का त्यों
बेशक रखा जाये लेकिन
खूनी के बदले कर दिया जाये
शहीद या फिर क़ुरबानी
तब खूनी दरवाजा 
शहीद दरवाजा या क़ुरबानी दरवाजा हो
रहेगा सदा ही गर्व से तना
और करेगा स्वागत 
हर राहगीर का 
उत्साह और प्रफुल्लता से।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह