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Tuesday, April 23, 2013

कविता: सजा

प्रसव वेदना का दर्द
झेल चुकी माँ 
खुशियों के संग पाती 
नन्हें शिशु को । 

होठों से शीश चूमती 
तभी कल्पनाएँ भी 
जन्म लेने लगती 
उसके बड़े हो जाने की । 

नजर न लगे 
अपनी आँखों का काजल 
अंगुली से निकाल 
लगा देती है टीका 
बीमारियों के टीके के साथ ।
बलात्कार की ख़बरें सुनकर 
बहुत दुःख होता है  
बलात्कारियों की हैवानियत 
मिटाना और कड़ी सजा मिलना जरुरी 
क्योंकि  
कई माएँ स्नेहमयी /ममतामयी निगाहों से 
आज भी खोज रही अपनी बच्चियों को । 

किंतु वे बच्चियाँ माँ के दूध का कर्ज 
कैसे चुकाएंगी ?
जिन दरिंदों की वजह से 
आज वे इस दुनिया में नहीं है । 


रचनाकार: संजय वर्मा "दृष्टि "

संपर्क: १ २ ५, शहीद भगत सिंह मार्ग 
मनावर, जिला -धार ( म. प्र. )