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Tuesday, September 30, 2014

और ऐसे बन गया मिनटों में इतिहास....!!!!

राक वैली एक्सप्रेस के चालक ने जैसे ही हरी झंडी दिखाते हुए सिलचर रेलवे स्टेशन से अपनी ट्रेन आगे बढ़ाई, मानो वक्त ने मिनटों में ही लगभग दो सदी का फ़ासला तय कर लिया. हर कोई इस पल को अपनी धरोहर बनाने के लिए बेताब था. यात्रा के दौरान शायद बिना टिकट चलने वाले लोगों ने भी महज संग्रह के लिए टिकट ख़रीदे. सैकडों मोबाइल कैमरों और मीडिया के दर्जनों कैमरों ने इस अंतिम रेल यात्रा को तस्वीरों में कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोई ट्रेन के साथ,तो कोई स्टेशन पर अपनी ‘सेल्फी’ खींचने में व्यस्त था. वहीँ ट्रेन में सवार कुछ लोगों के लिए यह महज रेल यात्रा नहीं बल्कि स्वयं को इतिहास के पन्नों का हिस्सा बनाने की कवायद थी. 30 साल की सरकारी सेवा पूरी कर चुके बराक वैली एक्सप्रेस के चालक सुनीलम चक्रवर्ती के लिए भी इस मार्ग पर यह अंतिम रेल यात्रा ही थी. भावुक होकर उन्होंने कहा- “पता नहीं अब इस मार्ग पर जीते जी कभी ट्रेन चलाने का अवसर मिलता भी है या नहीं.”
दरअसल असम की बराक वैली या भौगोलिक रूप से दक्षिण असम के लोगों की डेढ़ सौ साल तक ‘लाइफ लाइन’ रही मीटर गेज ट्रेनों के पहिए अब थम गए है. रेल मंत्रालय मीटर गेज को ब्राडगेज में बदलने जा रहा है और इस काम को निर्बाध रूप से पूरा करने के लिए एक अक्तूबर से यहाँ रेल सेवाएं फिलहाल छह माह के लिए पूरी तरह से बंद कर दी गयी हैं. अभी तक पूर्वोत्तर रेलवे के लामडिंग जंक्शन तक ब्राडगेज रेल लाइन है लेकिन लामडिंग से सिलचर के बीच 201 किमी का सफ़र मीटर गेज से तय करना पड़ता था. वैसे लामडिंग से सिलचर के इस सफ़र को देश का सबसे रोमांचक और प्राकृतिक विविधता से भरपूर रेल यात्रा माना जाता है. इस सफ़र के दौरान यात्रियों को पहाड़ों की हैरतअंगेज खूबसूरती के साथ 586 पुलों और 37 सुरंगों से होते हुए 24 रेलवे स्टेशनों को पार करना पड़ता था. बताया जाता है कि तमाम तकनीकी विकास के बाद भी जिस रेल लाइन को मीटरगेज से ब्राडगेज में बदलने में अब तक़रीबन बीस साल का समय लग रहा है,वहीँ 19 वीं सदी में अंग्रेजों ने महज 15 साल में पहाड़ों को काटकर और कंदराओं को पाटकर इस रेल लाइन को अमली जामा पहना दिया था. यहाँ के इतिहास के जानकारों के मुताबिक 1882 में सर्वप्रथम जान बोयर्स नामक इंजीनियर ने सुरमा वैली (बराक वैली का विभाजन से पहले का नाम ) को ब्रह्मपुत्र वैली से जोड़ने की परिकल्पना की थी. फिर अगले पांच साल में परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई और 1887 में तत्कालीन सलाहकार इंजीनियर गुइल्फोर्ड मोल्सवर्थ ने इस मीटर गेज रेल परियोजना को मंजूरी दे दी. फिर 1888 से यहाँ निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1 दिसंबर 1903 से यहाँ रेल सफ़र शुरू हो गया.     अतीत से विकास के इस सफ़र में मीटर गेज और इस पर आज के गतिशील दौर में भी कछुआ चाल से चलने वाली ट्रेने अब संग्रहालय का हिस्सा बन जाएंगी क्योंकि पटरियों का आकर बदलने के साथ ही यहाँ सब-कुछ बदल जाएगा. सिलचर स्टेशन का विकास व विस्तार होगा और शायद स्थान भी बदलेगा. कई छोटे स्टेशन कागज़ों में सिमट जाएंगे. कई की रोजी-रोटी छिनेगी और विस्तार की आंधी में कुछ के घर भी उजड़ेंगे. धीमी और सुकून से चलने वाली ट्रेनों के स्थान पर राजधानी-शताब्दी जैसी चमक-दमक और गति वाली ट्रेने दौड़ती नजर आएगी. बराक वैली के साथ साथ  त्रिपुरा,मिज़ोरम तथा मणिपुर जैसे राज्य वर्षों से इस बदलाव की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन सदियों का रिश्ता एक पल में तो नहीं तोडा जा सकता इसलिए मीटर गेज को विदाई देने के लिए फूल मालाओं और ढोल-ढमाकों के साथ पूरा शहर मौजूद था. सभी दुखी थेऔर साथ में खुश भी क्योंकि इस विछोह में ही सुनहरे भविष्य के सपने छिपे हैं.