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सावधान! पुलिस मंच पर है

Saturday, August 23, 2014

ग़ज़ल

साथ रहकर मेरे शादमाँ कुछ नहीं ǀ
लाख पूछूं वो करता बयाँ कुछ नहीं ǀǀ
आपसी रिश्ते से, डर से, लालच से या ǀ
सच जो कह न सके वो ज़ुबां कुछ नहीं ǀǀ
जो भी जैसा करे पाए वैसा सिला ǀ
सब तेरे सामने है निहाँ कुछ नहीं ǀǀ
काम आए न गर्दिश में बच्चों के जो ǀ
कहना पड़ता है दुःख से वो माँ कुछ नहीं ǀǀ
जो रियाया के दुःख से रहे बेख़बर ǀ
मेरा दावा है वो हुक्मरां कुछ नहीं ǀǀ
आए दर पर सवाली जो उम्मीद ले ǀ
जाए मायूस तो आस्तां कुछ नहीं ǀǀ
मेहनतें चाहे जितनी करे वो ‘असर’ ǀ
जो चमन उजड़ा तो बागबां कुछ नहीं ǀǀ

© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ ख़ास, नई दिल्ली