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Thursday, December 20, 2012

कविता: पुरुष या फिर...?


प्रेमिका प्रेमी से नज़रें फिरा बोली-
"कैसे करूँ यकीन तुम पर 
कि तुम भी तो 
उसी पुरुष समाज के अंश हो  
जिसने नारी को नारी न समझ
समझा है केवल एक ऐसी वस्तु
जिसे मनचाहे ढंग से करो इस्तेमाल
हाँ तुम भी तो हो 
उसी सड़ी मानसिकता के अभिन्न अंग
जिसने नारी को 
जितना नोंचा जा सकता था नोंचा
और फिर फैंक दिया 
सड़क के किनारे या फिर 
किसी सुनसान पार्क के 
किसी अंधेरे कोने में."
प्रेमी ने प्रेमिका का 
प्रेम से हाथ पकड़ा और उससे पूछा-
"प्रिये क्या वास्तव में 
वे पुरुष ही थे 
या फिर पुरुष के वेश में...?

रचनाकार-सुमित प्रताप सिंह 


*चित्र गूगल से साभार*