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Friday, December 21, 2012

शोभना काव्य सृजन पुरस्कार प्रविष्टि संख्या - 11


                       विषय: नारी शोषण 

रामलाल की बेटी की शादी भी खूब थी 
उसने लगा दी अपने जीवन भर की पूँजी इसमें 
और फिर भी दूल्हे के बाप को उनसे शिकायतें बहुत थीं

रामलाल की बेटी .............................................

कार, टीवी, अलमारी, फ्रिज़, 
यूँ तो तमाम सामान दिया था उसने दहेज़ में 
मगर वो नगद में उन्हें कुछ दे नहीं पाया 
बस इसी एक भूल से उसकी पगड़ी उसके समधी के पैरो में पड़ी थी 

रामलाल की बेटी ..................................................

बारात में आये यूँ तो हर इंसान ने पेट भर खाया 
मगर फिर भी उन्हें खाने के मैनू में कमियाँ ही खल रही थी 
शादी के तमाम- तामझाम में यूँ तो रामलाल महिनो पिसता रहा  
मगर इतना सबकुछ करने के बाद भी उसके चेहरे पे दुःख 
और उसके दिल में पछतावा था 
बस एक उसको छोड़कर बाकी सारी बारात की ऐश हो रही थी 

रामलाल की बेटी .................................................

एक बेटी का बाप होना शायद इसी  को कहते है 
घर में जब एक जवान बेटी हो तो उसको बियाहने तक 
एक बाप रोज़ यूँ ही हजारो मौत मरता है 
उसकी शादी के लिए वो अपना पेट काटकर तिनका-तिनका करके दहेज का सामान इकट्ठा  करता है 
और जब इतना सबकुछ करने के बाद भी वो नाकामयाब हो जाये 
तो वो अपनी बेटी की डोली/ विदाई के साथ खुद की अर्थी के फूल चुनता है 
रोज़ बाराते आती है और शादियाँ होती है 
मगर एक बाप के दिल में हमेशा यही एक खौफ़जदा रहता है 
बारात चले गई क्या-बारात चली गई क्या - बारात चली गई क्या

रचनाकार- श्री जयदेव जोनवाल


करोलबाग, नई दिल्ली