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Tuesday, October 16, 2012

कविता: सुख - दुःख

चित्र गूगल से साभार


छत पर लेटे

अक्सर चंदा

देखता हूँ

मैं तुझे,



घोर अंधकार से

तारों के साथ मैं

जूझता पाता हूँ

मैं तुझे.



तेरा स्वरुप

हर रात

घटता हुआ

पाता हूँ मैं


और एक दिन

सिर्फ अंधकार से

तुझको घिरा

पाता हूँ मैं


तब आभास

होता है

चंदा तेरी

लाचारी का


लेकिन

धीरे-धीरे

नित्य

जब बढ़ता है



तेरा स्वरुप

तो वही अंधकार

मेरे छत के

कोने मैं

छिपकर  बैठ जाता है



और ख़ुशी से

देखता

जाता हूँ

मैं तुझे.



रचनाकार- श्री वीरेश अरोड़ा "वीर"


निवास- अजमेर, राजस्थान (भारत)