सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।

सावधान! पुलिस मंच पर है

Thursday, November 13, 2014

ग़ज़ल

सुबहदम हमको जगाता कौन है।
रात होने पर सुलाता कौन है।।

फूल कलियाँ पेड़ पौधे और फ़सल।
इनमे छुप कर लहलहाता कौन है।।

सोचता हूँ चाँद तारे देखकर
इनमें शब् भर झिलमिलाता कौन है।।

जो अभी पैदा हुआ समझे न कुछ।
उसके अंदर मुस्कुराता कौन है।।

कौन है जो भेजता है मुश्किलें।
और उनके हल सुझाता कौन है।।

भेजकर दुनिया में कुछ दिन के लिए।
हमको फिर वापस बुलाता कौन है।।

दे हुनर तेरे कलम को ए असर।
अज़्मते फ़न से मिलाता कौन है।।
   प्रमोद शर्मा ‘असर’
   हौज़ खास, नई दिल्ली