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सावधान! पुलिस मंच पर है

Sunday, September 28, 2014

मरते प्रहरी खामोश जनता


   क्सर देखा होगा कि सड़क पर या मोहल्ले में कोई झगड़ा या फसाद होता है तो जनता पुलिस को कोसती है और उससे उस झगड़े-फसाद को निपटाने की आशा करती है जनता को आशा करनी भी चाहिए, क्योंकि पुलिस का गठन ही इस कार्य के लिए हुआ है पुलिस समय-असमय जनता की रक्षा को तत्पर भी रहती है और ऐसा करते हुए वह अपनी जान पर भी खेल जाती है, किन्तु सोचने वाली बात यह है कि जनता की रक्षक पुलिस को जब खुद की रक्षा की जरूरत हो तो क्या जनता को सामने नहीं आना चाहिए? अभी हाल ही दिल्ली के मौजपुर इलाके में सिपाही धर्मपाल की दिन-दहाड़े दो बदमाशों ने गोली मारकर हत्या कर दी उस समय आसपास की दुकानों में काफी ग्राहक और दुकानदार मौजूद थे, लेकिन कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया और तो और घायल सिपाही को कोई अस्पताल तक पहुँचाने को तैयार नहीं हुआ शायद वहाँ मौजूद लोगों में नपुंसकता और हृदयहीनता कूट-कूटकर भरी होगी इस घटना की जानकारी जब दो सिपाहियों को मिली तो उन्होंने एक निजी कार चालक की सहायता से धर्मपाल को अस्पताल तक पहुँचाया
अगर यूँ ही प्रहरी मारे जाते रहेंगे तो देश में जंगलराज स्थापित होने में अधिक समय नहीं लगेगा सरकार से निवेदन है कि देश के प्रहरियों को यूँ सरेआम मारकर सरकार को खुली चुनौती देनेवालों को जल्द से जल्द पकड़कर जेल में ठूँसा जाए और फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से इन्हें सख्त से सख्त सज़ा दी जाए इन्हें न तो जमानत की सुविधा दी जाए और न ही पैरोल पर छोड़ा जाए इसके साथ ही मानवाधिकार आयोग से प्रार्थना है कि वो सिर्फ और सिर्फ मानवों के अधिकार के लिए ही आगे आए न कि दानवों के अधिकार के लिए. अन्यथा जब जनता को अपनी जान बचाने के लिए प्रहरियों की जरूरत होगी तो प्रहरी भी अपनी-अपनी जान बचाते हुए किसी पतली गली से निकल भागने में ही अपनी और अपने परिवार की भलाई समझेंगे.


सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत