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Tuesday, April 29, 2014

कविता : एक लड़की मुझको भाती है

कॉलेज में एक लड़का था
सबने ही उसको हड़का था
कविता एक ही कहता था
उसको ही कहता रहता था
एक लड़की मुझको भाती है-2
जब भी मौका मिलता तो
झट से आगे बढ़ता था
मंच कोई दिख जाये तो
फट से उसपे चढ़ता था
जब भी मुख खोलता तो
बस आवाज यही आती
एक लड़की मुझको भाती है-2
कॉलेज की सभी छात्राएँ
उससे डरा करती थीं
वो लड़की उनमें से न हो
यही कामना करती थीं
वो गायब हो जातीं
जब यह ध्वनि सुनाई दे जाती
एक लड़की मुझको भाती है-2
धीमे-धीमे कॉलेज का
पहला सत्र बीता
उस कविता ने कर दिया था
भेजा सबका रीता
यह सुनते ही सबकी
साँस वहीं रुक जाती
एक लड़की मुझको भाती है-2
एक दिन ईश्वर ने सबकी सुन ली
माँ-बाप ने एक कन्या चुन ली
एक दिन बैंड बजा दिया
लड़के का ब्याह रचा दिया
फेरे पड़ते-पड़ते भी
धड़कन थी उसकी गाती
एक लड़की मुझको भाती है-2
पर लड़का बिलकुल नियमी था
पूरा कविता प्रेमी था
सपनों में नित आकर
सपनी उस संग गाती
एक लड़की मुझको भाती है-2
एक दिन सोते-सोते
बडबडा रहा था
कविता यही
गुनगुना रहा था
एक लड़की मुझको भाती है-2
पत्नी को यह सुन बुरा लगा
धोखे का जैसे छुरा लगा
सीने पर उसके सवार हो बोली-
कौन है वो डायन
जो तुमको मुझसे ज्यादा भाती है
सपनों में तुम्हारे आकर
जो तुमसे प्रीत जताती है
पत्नी के डर से छूटा पसीना
पत्नी दिखी उसे डाकू हसीना
इससे पहले मर-मिटती वो मर्दानी
उसने सुना दी अपनी कहानी
प्रिये मैं साहित्य सेवक हूँ
एक छोटा-मोटा लेखक हूँ
एक फिल्म लिखने का
प्रस्ताव मिला था
जिससे मेरा मन
इतना खिला था
उसका ही दृश्य बना रहा था
बार-बार गुनगुना रहा था
सूरत मात्र तुम्हारी
मुझ फटीचर को भाती है
कसम तुम्हारी नहीं कोई लड़की
मेरे सपनों में आती है
दूर पत्नी की भ्रान्ति हुई
घर में फिर से शांति हुई
अब भी एक लड़की उसको भाती है
किन्तु उसकी पत्नी को देखते ही
कल्पनाओं से ही भाग जाती है. 

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत