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सावधान! पुलिस मंच पर है

Friday, December 6, 2013

कहानी: लिफ्ट

   रात के बारह बज चुके थे. दिलीप ने वक़्त पर आकर ड्यूटी से फारिग कर दिया. हालाँकि घर बहुत दूर था, लेकिन बैरक की खाट पर सोते हुए खटमलों से खून चुसवाने की बजाय अपने घर के बिस्तर पर चैन की नींद लेना ज्यादा ठीक लगा. मोटर साइकिल स्टार्ट करने जा ही रहा था, कि उस्ताद नफे ने समझाया- “रात में सिविल ड्रेस में ही रोड पर चलना चाहिए. रोड पर रात को ट्रक और टैम्पो बहुत चलते हैं. जाने साले ड्राइवर कब की दुश्मनी निकालकर मोटर साइकिल पर ट्रक या टैम्पो चढ़ा दें.
उस्ताद नफे की बात जम गई और अपनी पुलिस की ड्रेस उतारकर सिविल ड्रेस पहन ली. मोटर साइकिल के पहियों की हवा चैक करना मुनासिब समझा. अब मोटर साइकिल में स्कूटर की तरह एक्स्ट्रा स्टेपनी का आप्शन तो होता नहीं है.
कुछ देर में मोटर साइकिल रिंग रोड पर दौड़ने लगी. इतनी रात हो गई थी लेकिन ट्रैफिक जस का तस. पता नहीं लोग रात को सोते भी हैं या नहीं? मजनू का टीला आ चुका था. क्या यार कोई टीला-वीला है नहीं और नाम मजनू का टीला. लोग भी न कुछ भी नाम रख देते हैं. मजनू के टीले नाम के उस इलाके में तिब्बती रात को छंग (तिब्बती शराब) नामक लैला से अपना कलेजा सींचकर मजनू बने डोल रहे थे. कुछेक तो चीनी ड्रैगन को इतने अच्छे-अच्छे शब्द कह रहे थे कि उन्हें न सुना जाए तो ही अच्छा था. उनका ऐसा व्यवहार कुछ हद तक ठीक ही था. अब कोई आपको अपने देश से ही लात मारकर निकाल दे और आपको किसी दूसरे देश में शरणार्थी का जीवन जीना पड़े तो आप भी तिब्बतियों जैसा ही व्यवहार करेंगे.
चंदगी राम का अखाड़ा निकला तो सोचा जरा पेशाब ही कर ली जाए बहुत देर से रोक रखी थी. अब ट्रेनिंग के दिनों में तो उस्ताद के डर से तीन-तीन घंटे भी पेशाब रोके रखते थे, पर अब जब अपनी मर्जी के मालिक हैं तो फिर काहे को टट्टी-पेशाब को रोकना. एक सुनसान जगह पर झाडियाँ दिखीं तो वहीं मोटर साइकिल खड़ी करके इस काम को निपटा डालने का निश्चय किया. जैसे ही झाडियों की ओर बढ़ा झाडियों में कुछ सरसराहट सी हुई.
“कौन है बे?” चौंकना स्वाभाविक ही था.
“हाय-हाय जानेमन खफा क्यों होते हो? आ जाओ तुम्हें जन्नत के मजे दिलवा दूँ” ताली मारने और बोलने के अंदाज से मालूम हो गया था कि झाडियों में कोई छक्का है.
“साले पिछवाड़े दो डंडे पड़ेंगे तो जन्नत से बाहर आ जाएगा.” अब जब तेज पेशाब लगी हो और कोई डिस्टर्ब कर दे तो गुस्सा तो आता है न.
छक्का झाडियों से बाहर आया- “जनाब स्टाफ से लगते हो. मैंने सोचा कोई रंगीला आया है.”
पेशाब करके कुछ राहत महसूस हुई- “अबे तुम लोगों ने जवान लड़के बिगाड डाले.”
“साब बिगड़े तो सभी हैं क्या जवान और क्या बूढ़े. क्या करें मजबूरी है पेट भरने के लिए ये सब करना पड़ता है. वरना बीमारियाँ लेने का शौक किसे है?” छक्का झाडियों से बाहर निकलते हुए बोला.
मैं थोड़ा नरम हो गया- “अरे तो ये सब करना जरूरी है क्या? कोई और काम करके भी पेट भरा जा सकता है.”
“कहना आसान है साब. हमें भला कौन काम देगा? आपको देखकर कुछ आस जगी थी, लेकिन किस्मत ऐसी फूटी निकली कि बोनी ही खराब हो गई.” इतना कहकर वह झाडियों में लापता हो गया.
मोटर साइकिल फिर से स्टार्ट कर आगे बढ़ चला. तिब्बती मार्केट में चहल-पहल थी. तिब्बती दुकानदार फुर्सत के पलों का मजा ले रहे थे. सोचा कि चलो किसी दुकान को खुलवाकर दो-चार जींस खरीदकर उनकी आमदनी ही करवा दी जाए. पर फिर मन ने विचार किया कि क्या कम कमाई करते हैं ये दुकानदार. दिन भर तो ठगते रहते हैं ग्राहकों को. अब जब मन ही गवाही न दे तो फिर वो काम ही क्यों किया जाए?
बस अड्डा आ चुका था. बस स्टैंड पर नाट सर्विस की बस के इंतज़ार में सवारियाँ खड़ी हुई थीं. सोचा अगर कोई लिफ्ट माँगता है तो दे दूँगा. किसी की मदद करने से न तो मैं घिसूँगा और न ही मेरी मोटर साइकिल. पर खुद के सोचने से भला क्या होता है? जब किसी को लिफ्ट चाहिए ही नहीं तो काहे को दें?
यमुना विहार का हनुमान मंदिर आ चुका था. दिन में भक्तों की बहुत भीड़ होती है और रात में कंगलों की. साले रात में नशा करके एक-दूसरे की ऐसी-तैसी करने में मस्त थे. सामने लालकिले के बुर्ज पर सेना का संतरी चहलकदमी करने में व्यस्त था.
लालकिले से आगे बढ़ते ही समाधियों का साम्राज्य आरम्भ हो जाता है. उसे देखकर दिल में जलन होती है कि हम क्यों नहीं पैदा हुए ऐसे खानदान में जिसने जीते जी राज किया और मरकर भी. खैर राजघाट पार करते ही एक महिला ने लिफ्ट के लिए हाथ दे दिया. शायद बहती हवा ने उसे बता दिया होगा कि मैं आज रात लिफ्ट द्वारा जनसेवा करने के मूड में हूँ. उसने जहाँ छोड़ने की गुजारिश की वहाँ छोड़ दिया. थोड़ी दूर आगे बढ़ा था कि फिर से एक महिला लिफ्ट माँगती दिखाई दी. भलाई करने का फुल मूड था सो मोटर साइकिल  रोकी और उस महिला को बिठा लिया. आखें नींद के मारे आधी बंद हो चुकी थीं सो उस महिला से बस इतना ही पूछा कि कहाँ तक जाना है? कमाल की बात ये थी कि उसे भी कुछ दूर आगे ही जाना था. उसे उतारकर आगे बढ़ा. महारानी बाग आ चुका था और बस स्टैंड पर लिफ्ट लेने के लिए तीसरी महिला खड़ी हुई थी. अब दो को लिफ्ट दी फिर उस तीसरी ने क्या बिगाड़ा था? आश्रम का फ्लाई ओवर पार करके वह भी उतर गई.
नींद आँखों पर हावी होती जा रही थी, लेकिन मस्तिष्क अभी भी जाग्रत अवस्था में था. आज रात भला ऐसी क्या बात हो गई जो बार-बार लिफ्ट के लिए मुसीबत की मारी महिलाएँ ही मिलती हैं. क्या आज किसी पुरुष पर मुसीबत नहीं आई है? मजे की बात तो देखो कि तीन महिलाओं को लिफ्ट दी और तीनों एक ही कलर के कपड़ों की शौक़ीन. एक ही कलर क्यों एक डिजाइन की शौक़ीन. और तो और उनके मोटर साइकिल  पर बैठने और उतरने का भी अंदाज एक जैसा. अच्छा उनके परफ्यूम की खुशबू भी मिलती-जुलती थी.
अचानक आँखों की नींद गायब हो गई और मैं चौंकते हुए बडबडाया- अरे बाप रे! उन तीनों का चेहरा भी एक जैसा ही था. मतलब कि वो तीन नहीं बल्कि एक ही महिला थी जिसे मैंने बार-बार लिफ्ट दी.” लाजपत नगर का फ्लाई ओवर पार करते ही गुप्ता मार्केट का बस स्टैंड दिखा. बस स्टैंड पर एक और महिला लिफ्ट का इशारा कर रही थी. पहचानने में बस कुछ पल लगे कि वह तो वही महिला थी, जिसे तीन बार लिफ्ट दे चुका था. अब मेरी मोटर साइकिल तेजी से घर की ओर भाग रही थी और पीछे बस स्टैंड पर खड़ी वह महिला खिलखिलाकर हँसे जा रही थी.
सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत