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Monday, December 16, 2013

खुद से अज़नबी

देखा जो खुद के अक्स को
आईने में.....

कुछ था खोया-खोया सा
बहुत कुरेदा उसे
बहुत परोसा उसे
कुछ तो बोले
मुँह तो खोले.... 

पर न वो हिला, न डुला
बना रहा यूँ ही एक बुत....
देखता रहा एक टक मुझे
बिना पलक झपकाए...
ख़ामोशी से.....

पर न बोला वो
एक भी शब्द......
तमाम कोशिशें रहीं असफल
खुद के अक्स को पहचानने की....
उसे समझाने की......

न जाने क्यूँ हुआ एहसास
खुद से खुद को

अज़नबी होने का !!!!


रविश 'रवि'


फरीदाबाद