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Sunday, November 24, 2013

कविता: सुनो आखेटक !

आखेटक !!
क्या तुम्हें आभास है ?
कि तुम! मृगमरीचिका की   
जिजीविषा में
किसी का आखेट कर
जीवनयापन की मृगया में
भटकते हुये मदहोश हो !
आखेटक !
क्या तुम्हें आभास है ?
आखेटक को संजीवनी नहीं मिलती
मन की तृष्णा की खातिर
अनन्य मार्गदर्शी का भी
विसस्मरण कर दिया है
सृजनमाला को विस्फारित नेत्रों से
देखते हुए मदमस्त हो !
आखेटक !!
क्या भूल गए हो ?
आखेट करने को आया तीर
एक दिन तुम्हें भी बेध जाएगा
तब !!...... समक्ष राम न होंगे
सागर से उबरने को कर्म न होंगे
सुनो आखेटक !

अन्नपूर्णा बाजपेई
कानपुर, उत्तर प्रदेश