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Monday, October 21, 2013

कविता: क्या कहूँ

क्या कहूँ ...............
आहत मन की व्यथा
कैसे सुनाऊँ.................
मन की व्याकुलता
अश्रु और व्याकुलता
साथी है परस्पर
आकुल होकर आँख भी
जब छलक जाती है
गरम अश्रुओं का लावा
कपोलों को झुलसा जाता है
न जाने कब कैसे ...................
पीर आँखों की राह
चल पड़ती है बिना कुछ कहे
आकुल मन बस यूं ही
तकता रह जाता है
भाव विहीन होकर भी
भाव पूर्ण बन जाता है जब
जिह्वा सुन्न हो जाती है तब
न जाने कब कैसे .........................
कुछ आरोपों की पोटली
फिर खुल गई
मन ने आरोपित किया
आँख को ,
फिर भर आई शायद
मन और आँख
साथी हैं परस्पर
क्या कहूँ .......................... 

अन्नपूर्णा बाजपेई


कानपुर, उ.प्र.