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Saturday, August 31, 2013

टी.वी. भैया



   ड़ी बहन को टी.वी. देखने का बचपन से ही बड़ा शौक था, लेकिन उस समय घर में टी.वी. नहीं था. यह उसके लिए परेशानी का सबब था. इसी कारणवश उसने अपने जैसे नन्हें - मुन्ने दोस्त बना लिए और उनके घर टी.वी. देखने को जाने लगी. जिस प्रकार बांग्लादेशियों का जीवन अपने देश में बीत रहा है, उसी प्रकार उसका अधिकांश समय अपने घर की बजाय अपने दोस्तों के घर टी.वी. देखने में बीतने लगा था. हालाँकि माँ ने उसे कई बार मना किया, डांट-फटकार लगाई और उसके मुलायम गालों पर जोरदार चपत भी लगाई, लेकिन उसका टी.वी. प्रेम समाप्त नहीं हुआ. आख़िरकार परेशान होकर माँ के कहने पर पिता जी एक दिन टी.वी. खरीदने चल पड़े. उसी शाम टी.वी. भैया (बड़ी बहन द्वारा दिया नाम) घर आ पधारे. उनका रंग श्याम-श्वेत था तथा जाति से अर्जुन थे. यहाँ जाति का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि अपने देश में जातिवाद का सम्मानीय स्थान है. बड़ी बहन ने टी.वी. भैया का घर में जोरदार स्वागत किया. गृह प्रवेश से पहले उनकी आरती उतारी व उनके मस्तक पर तिलक लगाया. पूरी कालोनी को हमारे घर में टी.वी. के आगमन के विषय में पता चल गया था व उन्होंने अपने-अपने रजिस्टरों में हमारे परिवार में एक और सदस्य की आमद कर दी थी. टी.वी. भैया का बिजली रानी से संबंध स्थापित किया गया. उनके साथ आए उनके चेले एंटीना को छत पर स्थापित किया गया. टी.वी. भैया ने अपने चेले एंटीना को कड़ी हिदायत दी, कि वह आसमानी तरंगरुपी गेंदों को नियम से लपकता रहे और क्रिकेटरों की भांति मैच फिक्सिंग से बाज आए. टी.वी. भैया को आरंभ करने का सौभाग्य बड़ी बहन को ही मिला. इस प्रकार हम सबके आनंद भरे दिन व्यतीत होने लगे. बड़ी बहन ने अपने सभी दोस्तों से कट्टी कर ली और टी.वी. भैया के सानिध्य में ही अपना समय बिताने लगी. मैं भी टी.वी. भैया द्वारा दिखाए गए विभिन्न कार्यक्रमों को देखकर मस्त रहने लगा था. बड़े भाई ने भी हमारे मनोरंजन अभियान में अपना सहयोग दिया और किराये पर वी.सी.आर. लाकर पूरी-पूरी रात हिन्दी फिल्मों के शो दिखाए. हमारी छोटी बहन अपने नन्हें और कोमल हाथों से चाय बनाकर पिलाती और अपने योगदान को प्रदर्शित करके गौरवान्वित अनुभव करती. टी.वी. भैया के संग हमारा पूरा परिवार हँसी-खुशी से जीवन व्यतीत कर रहा था, लेकिन एक पक्ष हमारी खुशियों से दुखी था. वह था हमारे घर में छिपा हुआ चूहों का गैंग. हमारी और टी.वी. भैया की दिन-रात की सक्रियता से चूहा गैंग परेशान हो चुका था और इन विषम परिस्थितियों से निपटने का उपाय खोज रहा था. आने वाले दिन हमारे व टी.वी. भैया के लिए अच्छे न थे. एक दिन टी.वी. भैया के चेले एंटीना ने पतंग को डांट दिया और उसे धमकाया, कि वो उस जैसे ब्रम्हचारी को लाइन मारने से बाज आए. पतंग एंटीना से चिड़ गई और उसने अपने बॉय फ्रैंड  मंजा से एंटीना की झूठी शिकायत कर दी, कि वह उसे छेड़ रहा था. हालाँकि मंजे की दूसरी व तीसरी गर्ल फ्रेंड क्रमशः सद्दी व चरखड़ी ने मंजे को खूब समझाया कि एंटीना चारित्रिक रूप से ऐसा नहीं है, लेकिन मंजे के दिमाग में गुस्सा भर चुका था और उसने अपने कसरती बदन से एंटीना पर हमला कर दिया और अपनी मजबूत भुजाओं से उसका टेंटुआ बुरी तरह दबा दिया. इसी दौरान चूहा गैंग के आत्मघाती दस्ते ने तालिबानी स्टाइल में टी.वी. भैया के ऊपर हमला बोल दिया व उनके अंजर-पंजर ढीले कर डाले. टी.वी. भैया ने बिजली रानी के साथ मिलकर चूहों के आत्मघाती दस्ते का जमकर मुकाबला किया और दो-तीन चूहों को यमलोक पहुँचा दिया. एंटीना भी अपने गुरु की भांति दिलेर निकला और उसने अपना होश गँवाने से पहले पतंग को मंजे से जुदा कर दिया. पतंग को आवारा बच्चे लूटकर ले गए और किसी दूसरे मंजे से उसकी जोड़ी बना दी. बेचारा मंजा फूट-फूटकर रोया और उस घड़ी को कोसने लगा जब उसने पतंग पर यकीन करके उसकी बात मानी. टी.वी. भैया व उनके चेले की नाजुक हालत की वजह से कार्यक्रम साफ़ आने बिल्कुल बंद हो गए तथा एक दो-दिन बाद टी.वी. भैया के भीतर से कुछ सड़ने की दुर्गन्ध आई. जब उनका पिछला दरवाजा खोलकर तलाशी ली गई, तो चूहा गैंग के आत्मघाती दस्ते के आतंकी सदस्य मरे पड़े मिले. मैंने किसी प्रकार कपड़े से नाक ढंककर उन्हें नाले में जाकर फैंका. चूहों के गैंग ने हार नहीं मानी और पाकिस्तान की भांति निरंतर हमले करते रहे और हमारा परिवार अपने देश हिंदुस्तान की तरह पूरी स्थिति जानने हुए यह सब देखता रहा. इन हमलों से टी.वी. भैया की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही थी. उनका खाँस-खाँसकर बुरा हाल होता जा रहा था. डॉक्टर (मैकेनिक) को कई बार बुलाया गया, लेकिन वह उनका कोई स्थायी इलाज न कर सका. एक दिन बड़ी बहन ने चित्रहार देखने के लिए टी.वी. भैया को खोला, तो उन्होंने मच्छरों के अलावा कुछ नहीं दिखाया. बहन ने गुस्से में आकर उनके सिर पर डंडा दे मारा. डंडे की मार का ये असर हुआ, कि टी.वी. भैया चलने लगे. अब पूरे घर ने इसी फार्मूले को आजमाया और जब-तब टी.वी. भैया की पिटाई डंडे, चप्पल और जूते से पिटाई होने लगी. आखिर टी.वी. भैया कब तक मार को सहते. एक दिन उनकी सांसे मंद-मंद चलने लगीं. पिताजी उनकी बीमारी से परेशान होकर अगले दिन टी.वी. भैया की अगली पीढ़ी का रंगीन टी.वी. ले आए और उन्हें छज्जे पर पटक दिया गया. चूहों के गैंग को जब यह शुभ समाचार मिला तो उन्होंने टी.वी. भैया पर भयंकर आक्रमण करके उन्हें बिल्कुल निष्प्राण कर दिया और उनके भीतर ही अपना गुप्त अड्डा बना लिया. एक दिन टी.वी. भैया को कबाड़ी को बेच दिया गया. कुछ साल बीते और बहनें बड़ी हो गयीं व माँ के साथ सास-बहू के सीरियलों में मस्त रहने लगीं. पिता जी और हम दोनों भाई भी अपनी-अपनी ड्यूटी में व्यस्त रहने लगे. अब जब कभी रंगीन टी.वी. पर श्याम-श्वेत कार्यक्रम देखता हूँ, तो अपने टी.वी. भैया की याद में आँखें भर आती हैं. जाने उन्होंने दूसरा अवतार लिया है या फिर  समाधि लेकर धरती माँ की गोद में समा गए हैं. 

सुमित प्रताप सिंह 


इटावा, नई दिल्ली, भारत