सादर ब्लॉगस्ते पर आपका स्वागत है।

सावधान! पुलिस मंच पर है

Sunday, May 5, 2013

नवगीत

बढ़ गया शैवाल बन 
व्यापार काला 

ताल का जल 

आँखें मूंदे सो रहा 

रक्त रंजित हो गए 
सम्बन्ध सारे
फिर लहू जमने लगा है 
आत्मा पर 
सत्य का सूरज 
कहीं गुम  गया है 
झोपड़ी में बैठ 
जीवन रो रहा .


हो  गए ध्वंसित यहाँ के

तंतु सारे

जिस्म पर ढाँचा कोई
खिरने लगा है
चाँद लज्जा का
कहीं गुम हो गया
मान भी सम्मान
अपना खो रहा।

रचनाकार: सुश्री शशि पुरवार
इंदौर, मध्य प्रदेश