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Tuesday, March 12, 2013

शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 20

नारी हूँ मैं नदी नही

नारी हूँ मैं नदी नही
चाहे जैसे मोड़ लो मुझको
मनचाहे रास्ते से जोड़ लो मुझको
मुझमे भी कुछ पलता हैं
अंगारो सा जलता हैं
थोड़ा सा सुलगता हैं
तुम सोचो मैं धारा बन बहु  नही...
नील गगन मे उड़ू नही
क्या ऐसा हो सकता हैं
मुझमे भी कुछ पलता हैं
मुझे पता हैं सांसो की कीमत
मुझे पता जज्बातो की कीमत
क्या नदी जान पाई हैं?
क्या नारी को पहचान पाई हैं
नदी, नदी हैं.. नारी नही हैं
उसके कुछ उसूल हैं..
अविरल बहना, प्रतिपल बहना
कही ना अटकना, आगे बढ़ना
विरोध ना करना,
धैर्य रखना सदगुण उसने रखे हैं
नारी मे भी सब पलता हैं 
जब उसको कोई छलता हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं
पूरा आक्रोश, विरोध सब 
जतलाती हैं..
अनाचारण को वो अब सह
नही पाती हैं....
नारी श्रद्धा हैं, नारी पूजा हैं
नारी कोमलता हैं, नारी पूर्णता हैं
नारी धैर्या हैं लेकिन जब कब तक
जब तक कोई उसे छुए नही
जज्बातो को छेड़े नही
पीड़ा को घेरे नही..
वरना वो फिर दुर्गा हैं
काली हैं रणचंडी हैं
नही करती परवाह किसी की 
ऐसी वो वेगवती हैं..
अब बतलाओ नारी नारी हैं या
नारी एक नदी हैं?

रचनाकार: सुश्री अपर्णा खरे 

लखनऊ, उत्तर प्रदेश