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Saturday, February 23, 2013

शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 9

बेटियाँ 

वो नन्ही परियां होले से,
जब जीवन में आ जाती है,
घर भर में खुशियां छलक-छलक,
मुस्कुराहटें भर जाती है।
नाजुक पग, कोमल स्पर्श, चंचल सी हंसी,
सभी को फिर भा जाती है।
जिस घर मे बेटियां आती है,
वहाँ रौनके लग जाती है।
कभी कल्पना, कभी इन्दिरा, कभी टैरेसा बन जाती है,
कुल का नाम रौशन कर देती है, बेटियां जब पढ़ जाती है।
प्यार, विश्वास, दया, सहिष्णुता, त्याग सभी को सिखा जाती है,
धन्य है ये बेटियां, ये मकानों को ‘घर’ बनाती है।
दुःख आधा करके खुशियों को दुगनी कर जाती है,
‘‘पराया धन’’ नही ‘‘चक्रवृद्धि ब्याज’’ है यह
इस घर को महकाती है।
उस घर को भी सुरभित कर जाती है।
        
रचनाकार: सुश्री पूनम मेहता
कोटाराजस्थान