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सावधान! पुलिस मंच पर है

Sunday, February 24, 2013

शोभना काव्य सृजन पुरस्कार प्रविष्टि संख्या - 30

विषय: भ्रष्टाचार

जल पड़ी चिंगारी को और सुलगना होगा बुझती राख के ढेरों को शोलों में बदलना होगा उबालो ज़रा लहू बदन का, थामों मशालें हाथों में ठहरा हुआ है जो वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा फिर किसी गाँधी की आँखों में ख्वाबों को पलना होगा फिर किसी दधिची की हड्डियों को गलना होगा वक्त नहीं श्रृंगारों का, पथ है अंगारों का चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा जब तक प्राण रहे शरीर में, ये ज्योत जलानी है बहुत हुई मनमानी, लिखनी अब नयी कहानी है जम गया लहू तुम्हारी नसों का या अब भी इसमें रवानी है आओ देखें ज़रा इन ज़वान जिस्मों में, कितना खून है, कितना पानी है प्राण रहे जिस्म में या इस दहलीज़ पे माथा फूटे देश हित की रक्षा में निज हित छूटे तो छूटे हाथ रहे हाथों में प्रेयसी का या वादा टूटे वृक्ष हुआ पुराना अब जरा इसमें नव अंकुर फूटे बुनियादें तो हिली है कई बार, अब जरा ये दीवार टूटे अब न कोई गद्दार बचे, अब ना ये वतन लूटे साँसों से चाहे नाता टूटे, हाथो से ना तिरंगा छूटे अँधेरे कितना भी ताण्डव कर ले, सूरज को निकलना होगा कितना भी शोर मचा ले तूफाँ, मौसमों को बदलना होगा दौर नहीं मयखानों का, साकी का, जामों का, पैमानों का वक्त है पुकारों का, गीत गूँजे जयकारों का काँप उठे जर्रा जर्रा, देश के गद्दारों का दौर नहीं फनकारों का, वक्त नहीं श्रृंगारों का गीत गूँजे जयकारों का, शोर उठे ललकारों का ठंडी पड़ी शिराओं का लहू उबलना होगा फिर किसी भगत राजगुरु आज़ाद को घर से निकलना होगा ठहरा हुआ है जो वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा हो रहा चीरहरण अपने ही मौलिक अधिकारों का बेमोल बिकते व्यर्थ शब्दों के व्यापारों का अनगिनत सपने, अगणित इच्छाएँ, असीमित आकांक्षाएँ, असंख्य महत्वाकांक्षाएँ राष्ट्रप्रेम की ज्वाला में अरमाँ सब दलना होगा वक्त नहीं श्रृंगारों का, पथ है अंगारों का चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा ठहरा हुआ है जो वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा बहुत हुआ अपना अपना घर बार, माँ का प्यार दुलार देश के बेटों अब तो घर से निकलना होगा जल पड़ी चिंगारी को और सुलगना होगा बुझती राख के ढेरों को शोलों में बदलना होगा ठहरा हुआ है वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा


रचनाकार: श्री दिनेश गुप्ता 'दिन'
मंदसौर, मध्य प्रदेश