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Monday, December 17, 2012

शोभना काव्य सृजन पुरस्कार प्रविष्टि संख्या - 8


विषय: भ्रूण -हत्या

करते नित्य भ्रूण -हत्या अब होता  कैसा   महापाप ।
अपनी सन्तानों का वध कर खुश होते हम और आप।।
        घर के लोग हुये उत्साहित जब से भ्रूण गर्भ में  आया ।
        बाल वृद्ध नर-नारी सबने एक साथ मिल जश्न मनाया ।।
        शिशु को अभी गर्भ में आये माह हुआ है केवल तीजा  ।
        कहते घर के लोग कराने हेतु जाँच तू बहू अभी  जा  ।।
बेटी है तो गर्भपात ,सुन गर्भवती माँ गयी काँप ।
अपनी सन्तानों का वध कर ..............
         विडम्बना ये ऐसे निर्णय कभी -कभी ले जन्म दायिनी ।
         गर्भपात को करे विवश पति, उसको जो है अंकशायिनी ।।
         बेटा -बेटी में अन्तर कर, प्रकृति व्यवस्था छेड रहे  हैं ।
         निज उपवन लिंगानुपात की डाल विभाजक  मेड रहे हैं ।।
होगा कहाँ प्रेयसी -प्रिय के मिलने का वह मधुर ताप ।
अपनी सन्तानों का वध कर खुश होते हम और आप।।
        भेदभाव यदि बना रहा तो एक समय ऐसा आयेगा ।
        नारी एक, पुरुष एकाधिक पशुवत जीवन हो जायेगा ।।
        अनाचार अपराधों के घेरे में मानव जीवन होगा ।
        दानवता का अट्रटहास ,नित मानवता का क्रन्दन होगा
 बेटी परधन सुत अपना, बन्द करें  प्राचीन   जाप ।
अपनी सन्तनों का वध कर खुश होते हम और आप।।

  रचनाकार- श्री अशोक पाण्डेय "अनहद "

संपर्क- कृष्ण विहार ,कुल्ली खेरा मार्ग
अर्जुन गंज लखनऊ (उ. प्र.)
मो . 9415173092