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Saturday, November 3, 2012

परिवर्तन सच है तो फिर डर कैसा

रिवर्तन संसार का अपरिवर्तनीय सत्य है। मनुष्य इसे भली-भांति जानता भी है और मानता भी है। वह कहता भी है कि - परिवर्तन ही प्रकृति है। परिवर्तन ही जीवन है। फिर भी मनुष्य जीवन के कुछ परिवर्तन उसे व्यथित करते हैं। शारीरिक व्याधियां, प्रियजनों की मृत्यु, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक चुनौतियां, कर्मक्षेत्र में अस्थिरता आदि हम सबको प्रभावित करती हैं। जब परिवर्तन ही परम सत्य है तो फिर हम इन सब परिवर्तनों से व्यथित क्यों होते हैं? यह एक बड़ा सवाल है। इस समस्या का हल रविवार, ४ नवम्बर को सुबह १० बजे राष्ट्रीय चैनल डीडी-१ पर उपनिषद गंगा में दिखाया जाएगा, जड़ भरत की कथा के माध्यम से।
    हमारा शरीर, मन, बुद्धि परिवर्तन का अच्छा उदाहरण हैं। हम चाहते हैं कि यौवन ठहर जाए, बचपन वापिस आ जाए और वृद्धा अवस्था कभी न आए। हम खुद को शरीर मान चुके हैं। शरीर के सुख को ही हम असली सुख मानते हैं। हमारे सारे प्रयत्न, क्रियाकलाप इसी शारीरिक सुख की प्राप्ति के लिए हो रहे हैं। इंद्रियों की अवस्था और शक्ति पर हमारा सुख निर्भर करता है। बुद्धि कुछ समझ सकी तो स्वयं को बुद्धिमान और जब कुछ समझ में नहीं आता तो स्वयं को दु:खी पाते हैं। जिस तरह शरीर पर सुसज्जित आभूषण शरीर नहीं ठीक उसी यह शरीर, बुद्धि और मन आदि तो हमारे हैं लेकिन इनमें से कुछ भी हमारा नहीं है। यह विचार करने का विवेक ही हमें हमारे आत्म-स्वरूप से साक्षात्कार कराता है। आत्मा अपरिवर्तनीय है, अनादि है इसलिए अनंत है, अमृत है अर्थात अमर है। आत्मा शरीर, मन और बुद्धि का अर्थात् सारी अनात्म वस्तुओं की साक्षी है। इसी आत्म-ज्ञान को प्राप्त करने के लिए, भगवत-पुराण में वर्णित, ऋषभदेव के महापराक्रमी पुत्र भरत द्वारा किया गया आत्म-अनात्म विवेक प्रयाग आज भी प्रासांगिक है। 'उपनिषद गंगा'  के अगले प्रकरण में 'आत्म-अनात्म विवेक' विषय पर आधारित रोचक कथा 'जड़ भरत'  का प्रसारण रविवार (४ नवम्बर) सुबह १०:०० से १०:३० बजे तक डीडी नेशनल (डीडी-१) पर होगा।



प्रस्तुति- श्री लोकेन्द्र सिंह राजपूत
सीनियर सब एडिटर, नई दुनिया (ग्वालियर)