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Monday, October 1, 2012

संत के छक्के

बजती न  बाँसुरी, पायल  ना  बजती
बजती नहीं घंटी, विद्यालय ना खुलता

खुलता नहीं जो ज्ञान, मैल नहीं धुलता
धुलता ना मैल, नीर   नैन से टपकता

पकता है फल, टूट  धरती  पे गिरता
गिरता है शिशु, शनै: शनै: पग बढ़ता

बढ़ता है ज्वार, फ़ैल जाता जलाजल है
जल है  अपार,  धार होती  हलचल है

चल है सरिता झरनों की छलछल है
छल है  रहित, खगकुल  कलकल है

कल है भरोसा नहीं, काम आज करना
करना, ना डरना, ना  पग पीछे धरना

धरना ना पग पीछे  चलना है साथ-साथ
साथ-साथ काम करें, मिलके करोड़ों हाथ

हाथ एक से तो कभी ताली नहीं बजती
बजती खडग  अरि,  अरि  ललकारता

ललकारता है वीर  कितनों को मारता
मारता नहीं जो मन, वासना से हारता

‘तांक-झाँक’ करने से बिना बात बजती
बजती न बाँसुरी, तो पायल ना बजती

रचनाकार- डॉ. ब्रजपाल सिंह ‘संत’













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