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Friday, June 1, 2012

कविता: मेरी आवाज़



आवाज़ जो मुल्क की बेहतरी के लिए है
कोई दबा नहीं सकता|
दीवार जो मेरी आवाज़ रोक सके
कोई बना नहीं सकता|
जब जब चाहा जालिमों ऩे, आवाज़ दबी हो 
किस्सा कोई बता नहीं सकता|
क़त्ल कर सकते हो जिस्म का ए कातिल 
विचारों को कोई दबा नहीं सकता|
खिलेगा कोई फूल उपवन मे देखना उसको
खुशबु को कोई चुरा नहीं सकता|
कहाँ से पाला भ्रम अमर होने का,सियासतदानो 
मौत से कोई पार पा नहीं सकता|
दबाओ के कब तलक मेरी आवाज़ दरिंदों
हवाओं को कोई बाँध नहीं सकता|
सजा कर एक परिंदा पिंजरें मे ,जाने क्या समझे
परिंदों से गगन खाली रह नहीं सकता|
उड़ेगा बाज़ जब आसमाँ के सीने पर 
मौत किसकी लिखी बता नहीं सकता|
लिखा तकदीर मे तेरी क्या,तू क्या जाने
जो लिखा बदलवा नहीं सकता|
ध्यान रख कोई और है दुनिया चलाने वाला
बिना मर्जी के हाथ हिला नहीं सकता|
समझते थे कुछ लोग खुद को, खुदा बन गए
कहाँ खो गए बता नहीं सकता|
ना कर गुरुर अपनी ताकत पर नादान
साँसों की गिनती गिना नहीं सकता|

रचनाकार- डॉ. ए. कीर्तिवर्धन


संपर्क- 09911323732