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सावधान! पुलिस मंच पर है

Monday, May 7, 2012

गज़ल




पूछा था रात मैंने ये पागल चकोर से 
पैगाम कोई आया है चंदा की ओर से

बरसों हुए मिला था अचानक कभी कहीं
अब तक बंधा हुआ है जो यादों की डोर से

मुझको तो  सिर्फ उसकी ख़ामोशी का था पता
हैरां हूँ पास आ के समंदर के शोर से 

मैं चौंकता हूँ जब भी नज़र आए है कोई
इस दौर में भी हँसते हुए ज़ोर ज़ोर से

ये क्या हुआ है उम्र के अंतिम पड़ाव पर
माज़ी को देखता हूँ मैं बचपन के छोर से

लेखक- श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी 
***चित्र गूगल से साभार***