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Thursday, April 26, 2012

प्रेम गीत: सरिता


व्यथित  हृदय  की व्यथा  तुम्ही  हो, उर  अंतर  की कथा तुम्ही हो ,
यह अतीत  कैसे  विसराऊँ ,
एक बार आकर बतला  दो , कैसे प्रेम तराने गाऊँ .
मेरे मस्तक की गरिमा  पर, अपने  होठों  के स्पर्श से ,
तुमने जो अनुबंध  लिखे थे .
और तुम्हारे आकर्षण  पर ,मन के भावों  को गरमा  कर ,
मैंने  अनुपम छंद लिखे थे .
स्मृति धन की इस गठरी को कैसे अपने सीस  उठाऊँ .
एक बार आकर  बतला दो कैसे प्रेम तराने गाऊँ ......................
मैंने कितनी बार सुना था, आनी जानी इस दुनिया में ,
मिलन विरह का दुःख देता है .
पर मन ने ऐसा समझाया ,प्रिय  के कोमल आलिंगन  मै,
केवल प्यार जनम  लेता है .
दूर गए  तो बढ़ी  वेदना कैसे तुमको पास  बुलाऊँ .
एक बार आकर  बतला दो...............................................
बगिया के उस विजन क्षेत्र  में , सारे जग  से आँख  बचा कर ,
कुछ पल की ममतामय  चितवन .
लज्जामय कपोल अरुणारे, झुकी झुकी बोझिल पलकों  से ,
प्रियतम  तेरा मौन समर्पण .
निराधार  रह गई  जिंदगी , अब कैसा  आधार बनाऊँ.
एकबार ........................................................................
लेखक- डॉ. कृष्ण कान्त "मधुर"