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Monday, April 30, 2012

व्यंग्य: एक पत्र अतिथि महाराज के नाम




प्यारे अतिथि महाराज




सादर आफतस्ते!

अतिथि महाराज अभी तुमसे बिछुडे हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं, फिर भी आज मन किया कि तुम्हारे हाल-चाल ले लूँ। हालाँकि तुम्हारा मेरे घर आना आफत का आना ही है, किन्तु आफत या तुम्हें झेलते-झेलते अब तो आदत सी हो गई है। तुम्हारी जाने कब कुदृष्टि मेरे घर की ओर पड़ेगी और फिर से तुमसे मिलन हो पाएगा। तुम्हारा आना ही एक बला है, जिसे मुझ जैसा निर्बल मानव भला कैसे झेल पाता है, यह तो ईश्वर ही भली-भाँति जानता है। जब तुम आते हो, तो शुक्र-शनिचर और राहु-केतु इत्यादि अनेक ग्रह मेरे विपरीत हो जाते है। यहाँ आकर तुम्हारा पेट कुआँ बन जाता है, जिसमें एक महीने का राशन एक हफ्ते में ही डूब जाता है। मेरे गरीबखाने में प्रवेश करते ही तुम कुंभकर्ण की बिरादरी में शामिल हो जाते हो। तुम स्वयं तो दिन का दो-तिहाई भाग सोने में गुजार देते हो, किन्तु हम सभी तुम्हारे भयंकर खर्राटों के कारण एक पहर भी चैन से नहीं सो पाते हैं। यहाँ आते ही तुम्हारी फरमाइशें इतना विशाल रूप ले लेती हैं, जिनके सामने मेरी औकात दम तोड़ने लगती है। अपने देश में “अतिथि देवो भव” की कहावत जाने किस विद्वान ने चलाई होगी। जिसने भी यह कहावत आरम्भ की होगी, वह या तो कोई साधु संत होगा या फिर उसने तुम्हारे जैसे मानव को अतिथि के रूप में झेला नहीं होगा। “अतिथि देवो भव” कहावत के चक्कर में विदेशी आक्रमणकारी अतिथि बनकर भारत में आ धमके और यहाँ आकर देव बन बैठे। यह कहावत बनाने वाला कभी आज के समय में आकर देखे तो पता चलेगा, कि जीवन की गाड़ी इतनी महंगाई में कितनी कठिनाई से चल पाती है। वैसे तो बिना तिथि के आने वाले ही अतिथि होते है, किन्तु अपनी स्थिति को देखते हुए तुमसे निवेदन कर रहा हूँ, कि केवल एक छोटी सी सूचना दे दो, कि अतिथि फिर कब आओगे? यदि तुम्हारे आने का निश्चित दिन और समय ठीक-ठीक पता चल जाए ,तो मैं तुम्हारे कुएंरूपी पेट को भरने के लिए राशन का उचित प्रबंध कर सकूँ और तुम्हारी सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रख सकूँ और यदि यह सब न कर सकूँ, तो कम से कम अपने घर में ताला लगाकर अपने परिवार संग कहीं रफूचक्कर हो जाऊँ, ताकि तुम्हारे प्रकोप से बचा जा सके। इसीलिए अब बता भी दो न, कि अतिथि फिर कब आओगे?  

तुम्हारे आने की खबर पाते ही भागने को तत्पर

एक दुखी मेजबान